पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर छेड़छाड़ के आरोपी को जमानत का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज


नई दिल्लीः छेड़छाड़ के आरोपी को पीड़िता से राखी बंधवाने की शर्त पर जमानत देने के मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एएम खानविलकर की अगुवाई वाली बेंच के सामने एडवोकेट अपर्णा भट्ट और अन्य 8 महिला वकीलों ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए इस मामले में कुछ निर्देश जारी किए हैं। 

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले में जमानत की अर्जी पर सुनवाई के दौरान अदालत केस को कैसे डील करे, इसको लेकर निर्देश जारी किए हैं। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने छेड़छाड़ मामले में आरोपी को जमानत देते हुए शर्त लगाई थी कि वह पीड़िता से राखी बंधवाए। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में 9 महिला वकीलों ने चुनौती दी थी और कहा था कि यह फैसला कानून के सिद्धांत के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में अटॉर्नी जनरल से सहयोग करने को कहा था। 16 अक्टूबर को हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए 9 वकीलों ने गुहार लगाई थी कि इस फैसले पर रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट से कहा गया था कि हाई कोर्ट ने जो शर्त लगाई है कि वह न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। 

30 जुलाई के आदेश में हाई कोर्ट ने छेड़छाड के आरोपी को जमानत देते हुए शर्त लगाई थी कि वह अपनी पत्नी के साथ शिकायती लड़की के घर जाए और वह पीड़िता से आग्रह करे कि वह राखी बंधवाना चाहता है और वादा करता है कि वह उसकी रक्षा के लिए हमेशा हाजिर रहेगा। 

इस फैसले पर रोक लगाने की मांग करते हुए देशभर की महिला वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनकी ओर से पेश सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े और वकील अपर्णा भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि ये अति विशेष परिस्थिति है। इस तरह की शर्त लगाकर विक्टिम के ट्रॉमा को महत्वहीन बनाया जा रहा है। ऐसी शर्त कानून के सिद्धांत के विपरीत है। तब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि ये दलील मध्य प्रदेश को लेकर है या फिर पूरे देश को लेकर। तब एडवोकेट पारेख ने कहा था कि वह अपनी दलील पूरे देश को लेकर दे रहे हैं और गुहार लगाते हैं कि देशभर के कोर्ट चाहे ट्रायल कोर्ट हो या हाई कोर्ट, उन्हें इस तरह की शर्त लगाने से रोका जाना चाहिए। 

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल ऑफिस को नोटिस जारी किया था और उन्हें इस मामले में सहयोग करने को कहा गया है। 2 नवंबर 2020 को अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि हाई कोर्ट का आदेश यौन अपराधों को महत्वहीन बनाने के बराबर है। अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि इस तरह के आदेश की निंदा की जानी चाहिए। अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि समय की मांग है कि जजों के लिए लैंगिक संवेदनशीलता को लेकर प्रशिक्षण सत्र का आयोजन हो। उन्होंने कहा कि लैंगिंक संवेदनशीलता जजों के चयन के दौरान एक विषय की तरह हो और नैशनल जूडिशियल एकेडमी में इसे ट्रेनिंग के तौर पर दिया जाना चाहिए। अटॉर्नी जनरल ने कहा था कि जमानत देते वक्त जज जब शर्त निर्धारित करते हैं तो उन्हें सीआरपीसी की धारा 437 एवं 438 के तय प्रावधानों के तहत काम करना चाहिए। मौजूदा मामले में जो भी शर्तें लगाई गई है वह ड्रामा के सिवा कुछ नहीं है।