✍️ डा. पारस कोचर, एडवोकेट
होली में खेलते हुए रंग कितनों की तो हो ली यार
कितने लड़के लड़कियों की हो गई थी आँखे चार
गले में पहनाया गया था कइयों को जूतों का हार
होली खेलते झूम रहे थे मस्ती में सारे नर और नार
लाल हरा काला और न जाने कितने कैसे कैसे रंग
खेल रहे थे पिचकारियों से सब एक दूसरे के संग
लगता है कभी कभी तो जैसे हो रही आपस में जंग
किंतु जंग रूपी मस्ती देख कर सब हो जाते हैं दंग
डफ की धाप पर नाचना और मधुर लोक गीत गाना
किसी के घर जाकर उसे रंगना और कुछ भी खाना
साथ साथ खेलते हैं होली उस दिन दोहिता और नाना
होली की इस मस्ती को अपने दिल में ही उतार लेना
होली के दिन न है कोई छोटा और न कोई है बड़ा
चाहे निकालो गाली फिर भी कोई नहीं कभी लड़ा
अनजान को रंग दिया क्योंकि पास में वो था खड़ा
रिश्तों की गांठ को सबने बनाया मजबूत और कड़ा
होली तो साल में पारस सिर्फ एक दिन ही आती है
भाईचारा,खुशियां,सहनशीलता सब हमे सीखाती है
ऊंच नीच छुआ छूत छोटे बड़े का भेद भी मिटाती है
क्यों नहीं सारी जिंदगी होली के दिन सी बन जाती है

Post a Comment