लगातार आनलाइन क्लास का बच्चों की शारीरिक व मानसिक सेहत पर पड़ रहा बुरा असर


कोरोना के कारण स्कूल कई महीनों से बंद हैं। बच्चे इस समय ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूल टाइम शुरू होते ही ऑनलाइन क्लास लग जाती है। बच्चे घर से ही लैपटॉप, डेस्कटॉप या मोबाइल के जरिए इससे जुड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक दिन में घंटों चलने वाली ऑनलाइन पढ़ाई का बच्चों की शारीरिक व मानसिक सेहत पर भारी पड़ रहा है। छोटे बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। इस बात को नजरअंदाज करना काफी नुकसानदेह हो सकता है। बहुत से बच्चे इन दिनों आंखों में दबाव पड़ने और सिरदर्द की शिकायत कर रहे हैं। बहुत से बच्चों के स्वभाव में भी पिछले कुछ समय में चिड़चिड़ापन आया है। इसे लेकर अभिभावक भी काफी चिंतित हैं।

हावड़ा के एक प्रतिष्ठित स्कूल में तीसरी की छात्रा भाव्या की मां पूर्णिमा गोयल ने बताया- 'मेरी बेटी की सुबह 40 मिनट की लगातार तीन व दोपहर को 40 मिनट की लगातार दो क्लास चलती है। कभी-कभी वह आंखों पर दबाव पड़ने पर सिरदर्द की शिकायत करती है। उसमें थोड़ा चिड़चिड़ापन भी मैंने महसूस किया है। पहले जब मेरी बेटी सुबह से शाम तक स्कूल में पढ़ाई करके घर लौटती थी तो भी ऊर्जा व उत्साह से भरपूर नजर आती थी। वह स्कूल के माहौल व अपने सहपाठियों को बहुत मिस कर रही है।'

पूर्णिमा ने आगे कहा-'सुबह जो ऑनलाइन क्लास चलते हैं, वे हिंदी, अंग्रेजी, गणित जैसे विषयों के होते हैं, लेकिन दोपहर को ड्राइंग, सिंगिंग और डांसिंग के क्लास चलते हैं। मेरा मानना है कि फिलहाल एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टीविटीज के आनलाइन क्लास बंद कर दी जानी चाहिए। इससे ऑनलाइन क्लास के दबाव से कुछ राहत मिलेगी।'

क्या कहते हैं नेत्र विशेषज्ञ

जाने-माने नेत्र विशेषज्ञ एवं मेडिकल कॉलेज आरआइओ के निदेशक डॉ.असीम कुमार घोष ने कहा-' मोबाइल पर पढ़ाई करना आंखों के लिए बेहद नुकसानदेह है। एक तो मोबाइल का स्क्रीन काफी छोटा होता है और उससे रेडिएशन ज्यादा निकलता है। डेस्कटॉप और लैपटॉप पर पढ़ाई की जा सकती है लेकिन इसमें भी कुछ बातों का ध्यान रखना पड़ेगा। एक घंटा आनलाइन पढ़ाई करने पर दो घंटे आंखों को आराम देना पडे़गा। लगातार स्क्रीन पर देखने से आंखों की मांसपेशियां शुष्क हो सकती हैं। आंखों से पानी बहना शुरू हो सकता है। नजर कमजोर पड़ सकती है व नेत्र संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं। पांच से 10 साल की उम्र के बच्चों के लिए आनलाइन पढा़ई बिल्कुल सही नहीं है। सरकार को इस बारे में सोचना चाहिए।

क्या है चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट का कहना

चाइल्ड न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर दीप्तांशु दास ने कहा कि समस्या शारीरिक से ज्यादा मानसिक है क्योंकि आजकल तो छोटे बच्चे भी घंटों मोबाइल पर समय बिताते हैं। उन्होंने आगे कहा-"ऑनलाइन क्लास का चलन कोरोना महामारी के कारण अचानक से बढा़ है। यह पढ़ाई का नया तरीका है। अभिभावक अगर दबाव में होते हैं तो वह उनके बच्चों में भी आ जाता है। दरअसल ऑनलाइन पढ़ाई को लेकर अभिभावक ज्यादा विश्वासी नहीं हैं। ऑनलाइन क्लास को लेकर बच्चों का रवैया भी ज्यादा गंभीर नहीं दिख रहा। इसके कई कारण हैं। स्कूल का अलग माहौल होता है। बच्चे सहपाठियों के साथ बैठकर पढ़ाई करते हैं। आपस में बातचीत करते हैं।खेलते-कूदते हैं। टिफिन शेयर करते हैं।

ऑनलाइन क्लास वे घर में अकेले बैठकर करते हैं। बच्चे स्कूल के माहौल को मिस कर रहे हैं। उन्हें बोरियत पैदा हो रही है। पढ़ाई को लेकर पहले जैसा उत्साह नहीं है। प्रतिस्पर्धा की भावना भी कम होती जा रही है क्योंकि घर बैठे उन्हें कोई प्रतिस्पर्धी नहीं दिख रहा। इन सब कारणों से उनमें चिड़चिड़ापन आ रहा है। स्कूल वाले भी ऑनलाइन क्लास के नाम पर खानापूर्ति कर रहे हैं।'

नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एक शिक्षिका ने कहा-'क्लास में बैठकर पढ़ाने और ऑनलाइन क्लास लेने में जमीन-आसमान का अंतर तो है ही। बच्चे ही नहीं, हमें भी इस तरह से पढ़ाने में काफी परेशानी हो रही है। ऑनलाइन क्लास में हरेक बच्चे पर ध्यान दे पाना संभव नहीं हो पाता क्योंकि वे क्लास में नहीं बल्कि अपने घर में बैठे होते हैं।इंटरनेट कनेक्शन को लेकर भी काफी परेशानी होती है। चूंकि स्कूल प्रबंधन का निर्देश है इसलिए हमें ऑनलाइन क्लास लेनी ही पड़ेगी।' 

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