सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जनहित याचिकाकर्ता दुनिया की हर चीज नहीं मांग सकते, सुनवाई से किया इन्कार

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि जनहित याचिका दायर करने वालों को पूरी तैयारी करके आना चाहिए और यह ध्यान रखना चाहिए कि वे दुनिया की हर चीज नहीं मांग सकते। शीर्ष अदालत ने कहा कि नीति के मामले में कमी को इंगित करना जनहित याचिकाकर्ता का दायित्व है और इसके समर्थन में कुछ आंकड़े और उदाहरण भी होने चाहिए।

याचिकाकर्ता हर चीज अदालत या सरकार पर नहीं छोड़ सकता

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने उस जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इन्कार कर दिया, जिसमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति- 2017 को लागू करने, कोरोना से मृत लोगों के आश्रितों के लिए आजीविका की व्यवस्था करने और अन्य निर्देश देने की मांग की गई थी। इससे पहले पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिकाओं के साथ समस्या यह है कि आप कई मांगें करते हैं, अगर आप सिर्फ एक मांग करें तो हम इससे निपट सकते हैं, लेकिन आप दुनिया की हर चीज की मांग करने का दावा करते हैं। याचिकाकर्ता हर चीज अदालत या सरकार पर नहीं छोड़ सकता और नीति के अमल में कमी को दर्शाने वाले उदाहरण या आंकड़े तो दिखाने होंगे।

नीति के अमल में कमी को दर्शाने वाले उदाहरण या आंकड़े तो दिखाने होंगे

याचिकाकर्ता सी. अंजी रेड्डी की ओर से पेश अधिवक्ता श्रवण कुमार ने कहा कि उन्होंने आंध्र प्रदेश के रमेश का उदाहरण दिया है, जिन्होंने कोरोना महामारी के दौरान निर्धन और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए मुफ्त और सस्ती स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अस्पताल में भर्ती होने पर लाखों रुपये खर्च किए। पीठ ने कहा, 'आप उचित याचिका और उचित मांग के साथ अदालत में आइए। हम मामले में नोटिस जारी करना चाहते हैं और इसे खारिज नहीं कर रहे हैं, लेकिन आपको कुछ आंकड़ों के साथ कुछ प्रदर्शित भी करना चाहिए।

आंध्र प्रदेश के एक रमेश कुमार के आधार पर हम पूरे देश के लिए निर्देश जारी नहीं कर सकते। उनके बारे में जानकारी का स्त्रोत क्या है?'श्रवण कुमार ने कहा कि उन्होंने कुछ आंकड़े संलग्न किए हैं जो दर्शाते हैं कि सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के रिक्त पदों को नहीं भरने की वजह से लोग निजी अस्पतालों में जाने को मजबूर हैं। इस पर पीठ ने कहा कि आकड़ों के बारे में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की एक रिपोर्ट के अलावा याचिका में कुछ नहीं है।

पीठ ने कहा, 'आप सिर्फ एक रिपोर्ट संलग्न करके अदालत से सब कुछ संभालने की उम्मीद नहीं कर सकते। यह नीतिगत मामले हैं। आप सिर्फ इतना नहीं कह सकते कि स्वास्थ्य नीति लागू कीजिए, 2021 का बजट लागू कीजिए। आपको कमी बतानी होगी और अनुपालन में विफलता इंगित करनी होगी। यह जनहित याचिका है, सिर्फ इसलिए आप दलील रखने के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते।' शीर्ष अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपनी तैयारी करनी होगी, विशिष्ट उदाहरण दीजिए, आंकड़े एकत्रित कीजिए और उनके मुताबिक अहम क्षेत्रों को इंगित कीजिए ताकि अदालत संबंधित प्राधिकारी या सरकार को नोटिस जारी कर सके।

श्रवण कुमार ने कहा कि याचिकाकर्ता के लिए आंकड़े हासिल करना कठिन होगा। इस पर पीठ ने कहा, 'अगर यह कठिन है तो अपने मुवक्किल से कहिए कि शांति से बैठे। जाहिर है कि यह कठिन है और यह कठिन क्यों नहीं होना चाहिए? यह कोई ऐसा मामला नहीं है कि एक कैदी ने पोस्टकार्ड पर अपनी शिकायत लिखकर भेजी हो जिसमें हम तत्काल हस्तक्षेप करें। आप एक नीतिगत मसला उठा रहे हैं जिसके देशव्यापी प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए आपको दायित्व उठाना होगा।' इसके बाद शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति और विशिष्ट आकड़ों व उदाहरणों के साथ दूसरी याचिका दाखिल करने की छूट प्रदान कर दी।