‘आत्मनिर्भर झारखंड’: नई औद्योगिक नीति के माध्यम से उद्यमियों को प्रोत्साहित करने का हो रहा प्रयास

याद्दश्त पर थोड़ा जोर डालिए! पिछले साल कोरोना संक्रमण की पहली लहर के बाद जब देशव्यापी लाकडाउन लगा था, तब सड़क, बस अड्डे व रेलवे स्टेशनों पर भगदड़ की क्या स्थिति थी? हर कोई किसी तरह अपने घर पहुंचना चाह रहा था। तमाम प्रांतों में रोजी-रोटी और बेहतर जिंदगी की तलाश में गए झारखंडी भी इससे अलग नहीं थे। लाखों की संख्या में मजदूर व अन्य कुशल-अकुशल कामगार राज्य लौटे थे। इनकी दुखभरी दास्तान ने आमजन से लेकर सत्ताधीशों तक को झकझोर कर रख दिया था। उसी समय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वादा किया था कि उनकी सरकार ऐसी नीतियां बनाएगी, जिससे राज्य में बड़ी संख्या में रोजगार पैदा हो।

सिर्फ दो जून की रोटी के लिए लोगों को हजारों किमी दूर जाकर काम करने की नौबत न आए। अब करीब डेढ़ साल बाद सरकार धीरे-धीरे उस दिशा में आगे बढ़ती हुई दिख रही है। नई औद्योगिक नीति के जरिये जहां उद्यमियों को राज्य में लाने के तमाम जतन किए जा रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (पीएमएफएमई) के जरिये राज्य में छोटे-छोटे उद्योगों का संजाल बिछाने की कवायद चल रही है। सरकार की सोच बिल्कुल सही दिख रही है, बशर्ते वह धरातल पर भी ठीक से उतर जाए।

पहली लहर के बाद पैदा हुए अभूतपूर्व संकट के बीच दैनिक जागरण ने ही सबसे पहले ‘आत्मनिर्भर झारखंड’ का नारा बुलंद किया था। बाकायदा संपादकीय अभियान चलाकर नीति नियंताओं को सोचने पर मजबूर करने का प्रयास किया था कि धन-धान्य से भरी इस धरती के लोग आखिर गरीबी में क्यों जी रहे हैं?

इससे निकलने के लिए छोटे-बड़े उद्योगों का पूरा संजाल बिछाना होगा। वन उत्पाद की ताकत को पहचानना होगा। चिरौंजी, लाह, बांस, काजू, इमली, महुआ, कटहल, केंदू पत्ता, आंवला, बेल, वनतुलसी सहित सैकड़ों प्रकार के हर्बल उत्पादों को प्रोसेस करके बाजार में बेचने के लिए फूड प्रोसेसिंग इकाइयों की पूरी सीरीज खड़ी करनी होगी। गठबंधन सरकार इस दिशा में अब बहुत संजीदगी से काम करने को तत्पर दिख रही है। पिछले कुछ महीने में जिस तरह से नई उद्योग नीति पर काम चल रहा है और उसमें सेक्टर वार ध्यान दिया जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में राज्य में कई छोटी-बड़ी इकाइयों के लगने की उम्मीद की जा सकती है।

सरकार दवा और चिकित्सा उपकरणों के निर्माण से जुड़े उद्योगों (फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज) को बढ़ावा देने के लिए निवेशकों को आधी दर पर जमीन उपलब्ध कराने जा रही है। निवेशकों को जमीन की कीमत पांच साल में 10 बराबर किस्तों में चुकाने की छूट भी प्रदान करेगी। ऐसी इकाइयों को स्टांप ड्यूटी तथा निबंधन में 100 प्रतिशत तक की छूट मिलेगी। राज्य सरकार इसके लिए झारखंड फार्मास्यूटिकल पालिसी-2021 लागू करेगी, जिसका ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। फार्मा उद्योग के माध्यम से 20 हजार स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष रोजगार तथा दो हजार करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य रखा गया है। पालिसी में निवेशकों को कैपिटल इनवेस्टमेंट पर 25 प्रतिशत इंसेंटिव का भी प्रविधान है। निवेशकों को बिजली तथा जीएसटी में भी रियायतें देने का प्रविधान किया गया है।

झारखंड में खनिज की बहुलता के कारण फेरियस सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट, अल्युमीनियम हाइड्रोक्साइड, जिंक आक्साइड आदि दवा के निर्माण की काफी संभावनाएं हैं। यहां वार्षिक तौर पर 52 हजार टन लघु वनोपजों का उत्पादन होता है। इनमें अर्जुन छाल, आंवला, सर्पगंधा, कालमेघ, सोना छाल, सतावर आदि शामिल हैं। राज्य में वर्तमान में फार्मा के सब सेक्टर से संबंधित 90 इकाइयां कार्यरत हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार के सहयोग से पीएमएफएमई की झारखंड में शुरुआत करने के लिए केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वीकृति प्रदान की है। इसके तहत राज्य के 15 उत्पादों का चयन किया गया है। इसके जरिये छोटी-छोटी फूड प्रोसेसिंग इकाइयों को प्रोत्साहित किया जाएगा। इस योजना में निवेश करने के इच्छुक लोगों को भी 10 लाख रुपये तक अनुदान मिलेगा। राज्य में ऐसी इकाइयों की संख्या 5900 तक हो सकती है। इस प्रकार हर जिले में औसतन 250 छोटे उद्यमियों अथवा स्वयं सहायता समूहों की मदद की जा सकेगी। निवेशकों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकार 110 करोड़ रुपये भी खर्च करेगी। इससे संबंधित प्रस्ताव भी जल्द ही कैबिनेट में आएगा।