नेपाल का जेन जी विद्रोह : हिंसा और आगजनी का पूर्व नियोजित षड्यंत्र


काठमांडू: तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध को हटाने और सुशासन की मांग को लेकर 8 और 9 सितंबर 2025 को हुए ‘जेनजी आंदोलन’ को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की विस्तृत जांच रिपोर्ट के अनुसार यह प्रदर्शन स्वतःस्फूर्त और शांतिपूर्ण नहीं था, बल्कि इसे हिंसक और विध्वंसात्मक बनाने की गंभीर पूर्व-योजना भी बनाई गई थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जहां एक समूह आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखना चाहता था, वहीं दूसरे समूह ने योजनाबद्ध तरीके से इसे “हाइजैक” कर संसद भवन तक में आगजनी करने की तैयारी की थी। सोशल मीडिया प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर माइतीघर में जुटे युवाओं की भीड़ में गलत मंशा रखने वाले तत्व योजनाबद्ध तरीके से घुसपैठ कर हिंसा भड़काने में सक्रिय थे।

आयोग के अनुसार, आंदोलन को हिंसक बनाने की तैयारी प्रदर्शन से पहले ही डिजिटल माध्यमों के जरिए शुरू हो चुकी थी। कुछ व्यक्तियों ने आंदोलन को “परिणाममुखी” बनाने के नाम पर विभिन्न विद्यालयों के डिजिटल बोर्ड और वेबसाइट हैक कर “No more screens, we are on streets” तथा “We dont want likes - we want change - 8 September 2025” जैसे नारे प्रदर्शित किए थे।

इतना ही नहीं, प्रदर्शन से एक दिन पहले “Wake Up Nepal” नामक टिकटॉक अकाउंट से “Anything could happen in tomorrow’s protest, so be ready with a Molotov cocktail...” लिखकर पेट्रोल बम तैयार कर लाने का सार्वजनिक आह्वान किया गया था। आयोग ने कहा है कि संसद भवन और सिंहदरबार जैसी सरकारी संरचनाओं को जलते हुए दिखाने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से तैयार तस्वीरों और वीडियो को पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल किया गया था, जिससे विध्वंस की पूर्व-तैयारी की पुष्टि होती है।

रिपोर्ट में छात्रों को “मानव ढाल” के रूप में इस्तेमाल करने की साजिश का भी उल्लेख किया गया है। नेपाल पुलिस के नाम से एक फर्जी फेसबुक पेज बनाकर यह भ्रम फैलाया गया कि छात्र वर्दी में आने वालों पर पुलिस बल प्रयोग नहीं कर सकेगी। इसी बहाने सभी से स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर प्रदर्शन में आने की अपील की गई थी।

घटना के बाद उन सोशल मीडिया अकाउंट्स को निष्क्रिय कर दिए जाने को आयोग ने सुनियोजित चाल का प्रमाण माना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी पूर्वसूचनाओं और सुरागों के बावजूद सरकार और सुरक्षा एजेंसियां ऐसे खातों को बंद करने या अफवाहों का खंडन करने में विफल रहीं, जो उनकी गंभीर कमजोरी को दर्शाता है।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि फर्जी फेसबुक पेज के माध्यम से प्रदर्शनकारियों को भ्रमित कर छात्रों को आंदोलन में शामिल कर “मानव ढाल” बनाने का प्रयास किया गया। सुरक्षा कर्मियों के बयान के आधार पर आयोग ने इस तथ्य को स्थापित माना है।

रिपोर्ट के अनुसार “हामी नेपाल” संस्था के सुदन गुरूंग, अंकित मल्ल और खेमराज साउद सहित अन्य लोगों ने जिला प्रशासन कार्यालय से 500 से 800 लोगों की उपस्थिति का अनुमान देकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति ली थी। लेकिन प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही माइतीघर मंडला में प्राथमिक उपचार के लिए टेंट, स्वास्थ्य स्वयंसेवक और तीन एम्बुलेंस की व्यवस्था कर दी गई थी, जिसे आयोग ने संदिग्ध माना है।

8 सितंबर की सुबह लगभग 9 बजे प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे जेनजी आंदोलन के अगुवा माने जाने वाले रक्षा बम और जस्मिन ओझा के समूह ने इस तैयारी पर आपत्ति जताई थी और सुदन गुरूंग से सवाल भी किया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए इतनी बड़ी मेडिकल तैयारी क्यों की गई। हालांकि गुरूंग इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे सके।

सुबह साढ़े 10 बजे माइतीघर से शुरू हुआ प्रदर्शन प्रशासन द्वारा तय दायरे से बाहर निकलकर बबरमहल होते हुए नया बानेश्वर स्थित एवरेस्ट होटल के सामने पहुंचा, जिसके बाद स्थिति उग्र हो गई। करीब 25 हजार लोगों की भीड़ में अचानक काले टी-शर्ट पहने और शरीर पर “TOB” टैटू बनवाए 15 से 20 बाइकर्स का समूह प्रवेश कर गया। आयोग के अनुसार इसी समूह ने भीड़ को भड़काने और उत्तेजित करने का काम किया।

करीब 12 बजे सुदन गुरूंग के नेतृत्व में प्रदर्शनकारी सुरक्षा बैरिकेड तोड़कर निषेधित क्षेत्र में घुसने लगे, जिसके बाद सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हुई और स्थिति हिंसक दंगे में बदल गई।

आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षाकर्मियों के साथ मुठभेड़ के बाद ही पुलिस ने आंसू गैस और पानी की बौछार का इस्तेमाल किया। इसके बाद उग्र भीड़ ने संसद भवन के गेट नंबर 1 के सामने पथराव किया और सशस्त्र पुलिस के वाटर कैनन में तोड़फोड़ की। भीड़ इतनी हिंसक हो गई कि एम्बुलेंस, मानवाधिकार आयोग की निगरानी टीम की गाड़ी तक में तोड़फोड़ और आगजनी की गई तथा कर्मचारियों के साथ मारपीट की गई।

आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि युवाओं के शांतिपूर्ण विरोध को “TOB” समूह ने कब्जे में लेकर संसद भवन पर हमला और आगजनी करने तक का प्रयास किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसी स्थिति बनने के दौरान आयोजकों ने घुसपैठ रोकने का कोई प्रयास नहीं किया, इसलिए जनधन की क्षति की मुख्य जिम्मेदारी भी आयोजकों की ही बनती है।

साथ ही आयोग ने यह भी कहा है कि “TOB” लिखे टी-शर्ट और टैटू वाले बाइकर्स कौन थे, उनका आयोजकों से क्या संबंध था और वे किसके इशारे पर काम कर रहे थे, इसकी आगे गहन जांच की जानी आवश्यक है।

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