आदिवासी समाज और सरना परंपरा ही सनातन संस्कृति का मूल आधार : जेपी पांडेय


रांची: आदिवासी समाज और उसकी सरना परंपरा ही सनातन संस्कृति के मूलाधार स्तंभ हैं। आदिवासी संस्कृति को समझे बिना सनातन संस्कृति को समझना संभव नहीं है, क्योंकि जनजातीय समाज के जीवन-मूल्य, प्राकृतिक चिंतन और सामाजिक समरसता में ही सनातन संस्कृति की गहरी जड़ें निहित हैं। झारखंड राज्य समाज कल्याण आंगनवाड़ी कर्मचारी संघ के संयोजक जय प्रकाश पांडेय शनिवार को ये बातें कहीं।

जय प्रकाश पांडेय ने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति, देव-आस्था, लोकजीवन और सामूहिकता को केंद्र में रखकर जीवन जीता आया है। वन, पर्वत, नदी, सूर्य, अग्नि, पृथ्वी और वृक्षों की उपासना आदिवासी जीवन का अभिन्न हिस्सा है और यही तत्व सनातन परंपरा के भी मूल केंद्र माने जाते हैं।

उन्होंने कहा कि सरना और सनातन किसी संस्थागत संप्रदाय के नाम नहीं, बल्कि जीवन पद्धति और सांस्कृतिक चेतना के दो स्वरूप हैं। भारतीय दर्शन की अपरिग्रह, सादगी और सामूहिक जीवन की अवधारणाएं आज भी आदिवासी समाज में जीवंत रूप में दिखाई देती हैं।

जेपी पांडेय ने कहा कि रामायण काल से लेकर ऐतिहासिक कालखंड तक महर्षि वाल्मीकि, निषादराज और माता शबरी जैसे उदाहरण आदिवासी समाज के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक योगदान को प्रमाणित करते हैं। उन्होंने कहा कि सरना और सनातन को अलग-अलग या परस्पर विरोधी रूप में देखने के बजाय इन्हें साझा सांस्कृतिक विरासत के रूप में समझा जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज भारतीय सांस्कृतिक एकता और विविधता का प्राकृतिक आधार है और उसका सम्मान ही सनातन संस्कृति की सच्ची रक्षा है। पांडेय ने कहा कि आदिवासी समाज में पाहन और पारंपरिक समूहों के माध्यम से अदृश्य शक्तियों की अनुभूति की जाती है, जो सखुआ वृक्ष में विराजमान मानी जाती हैं। यही भाव सनातन परंपरा के दैनिक अनुष्ठानों में भी दृष्टिगोचर होता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सनातन परंपरा में पीपल और तुलसी की पूजा सदियों से होती आ रही है। पर्व-त्योहारों के दौरान मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा या सत्यनारायण कथा में गौरी-गणेश की प्रतिमा में मंत्रोच्चारण के माध्यम से देवत्व का आह्वान किया जाता है, जो अदृश्य और परम शक्ति की उपासना का प्रतीक है।

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