Bihar Election 2020: बिहार में कम नहीं हुई है नीतीश कुमार की चुनौतियां, तेजस्‍वी ने खेला है रोजगार का कार्ड

बिहार में विधानसभा का चुनाव हो रहा है। नीतीश कुमार को बिहार में सुशासन बाबू कहा जाता है। यह एक भारी शब्द है। इसने नीतीश कुमार को एक शख्सियत प्रदान की है। हालांकि इस चुनाव में अब भाजपा की ताकत भी उनके साथ है। बावजूद इसके उनकी चुनौतियां कम नहीं दिखती हैं। इनके खिलाफ खड़े राजद के तेजस्वी यादव प्रदेश के युवाओं को दस लाख नौकरी देने की बात कह रहे हैं। कोरोना के चलते लोगों के काम छिने हैं और बिहार के लोगों को इसकी सख्त आवश्यकता है। इसी को देखते हुए तेजस्वी ने रोजगार का कार्ड खेला है।

वास्तव में लॉकडाउन के दौरान सबसे ज्यादा कामगार उत्तर प्रदेश और बिहार लौटे थे। 2019-20 के इकोनॉमिक सर्वे में बिहार के ग्रामीण इलाकों में 6.8 और शहरी इलाकों में 9 फीसद बेरोजगारी दर थी, जो कोरोना के चलते और बढ़ी है। देखा जाए तो रोजगार और विकास आदि से जुड़ा चुनावी वादा कोई नई बात नहीं है, मगर यह बात कितने राजनीतिक दल समझना चाहते हैं कि बुनियादी विकास का आधार सुशासन ही है और यही लोक विकास की कुंजी भी है, जिसके आभाव में न तो विकास संभव है और न ही चुनावी वायदे पूरे किए जा सकते हैं। यद्यपि सुशासन को लेकर आम लोगों में भी विभिन्न विचार हो सकते हैं, पर इसमें कोई दुविधा नहीं कि सुशासन लोगों के सशक्तीकरण का एक बड़ा आयाम है, जो शासन को अधिक खुला, पारदर्शी, संवेदनशील, उत्तरदायी और न्यायसंगत बनाता है।

जाहिर है कानून-व्यवस्था, बेहतर नियोजन एवं क्रियान्वयन के साथ क्षमतापूर्वक सेवा प्रदायन जब तक सभी तक नहीं पहुंचेगा, तब तक रोजगार समेत समावेशी विकास संभव नहीं होगा और सुशासन की परिभाषा भी अधूरी बनी रहेगी। इतना ही नहीं, चुनाव में किए गए लोक-लुभावन वायदे भी जमीन पर नहीं उतारे जा सकते। बिहार में रोजगार की व्यापक संभावनाएं तब पैदा हो सकेंगी, जब समावेशी विकास को ध्यान में रखकर आधारभूत संरचना, प्रक्रिया और दक्षता से भरी शासन पद्धति सुनिश्चित होगी। यही कारण है कि होमवर्क की कमी के चलते राजनीतिक दल युवाओं को लुभाने के लिए रोजगार के बड़े इरादे जताते हैं, पर जब शासन में जाते हैं तो उपरोक्त खामियों के चलते इंच भर आगे नहीं बढ़ पाते।

बेशक देश और प्रदेश की सत्ता पुराने प्रारूप से बाहर निकल गई हों, मगर दावे और वादे का पूर्ण होना अभी दूर की कौड़ी है। बिहार में कौशल विकास के संस्थान भी अधिक नहीं हैं और जो हैं वे भी हांफ रहे हैं। हालांकि इस मामले में देश की हालत भी अच्छी नहीं है। बहरहाल बिहार भी सुख, शांति और समृद्धि का हकदार है। इसे प्राप्त कराने में राज्य सरकार को सुशासन की राह पर चलना ही होगा। संवेदनशीलता और लोक कल्याण सुशासन के स्तंभ हैं। अगर नीतीश कुमार के खिलाफ चुनाव लड़ रहे तेजस्वी यादव के मन में सिर्फ रोजगार की बात है तो वह सुशासन के बिना इसे जमीन पर नहीं उतार पाएंगे।

याद रखें यदि प्रदेश में किसी सुशासन आ जाता है और वह टिकाऊ बना रहता है तो वहां देर-सबेर रोजगार की संभावनाएं भी पैदा हो जाती हैं। जब तक कृषि क्षेत्र और इससे जुड़ा मानव संसाधन शोषित रहेगा, तब तक देश सुशासन की राह पर है कहना बेमानी होगा। वक्त तो यही कहता है कि सरकार से उम्मीद की जाए, पर भरोसा तब किया जाए जब उसके द्वारा वादे निभाए गए हों।

सच तो यह है कि सरकारी तंत्र में सुशासन एक ऐसी कुंजी है जो सरकार की ही नहीं, जनता की भी सेहत सुधारती है। ऐसे में चुनाव कोई भी जीते जनता के लिए विकास का दरवाजा तब खुलेगा, जब सत्ता सुशासन को अंगीकृत करेगी और बार-बार इस सुशासन को दोहराएगी।


ADVERTISEMENT