कोरोना के बाद चीन के कारोबारी 'अटैक' के खिलाफ भारत सहित पूरी दुनिया हुई एकजुट


चीन अपने यहां कोरोना पर लगभग काबू पा चुका है और अब यह मौजूदा हालात में दुनिया के दूसरे देशों की कमजोरी का फायदा उठाकर उनकी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कारोबारी 'अटैक' में लग गया है. लेकिन इस बार दुनिया सचेत है और भारत सहित कई देशों ने चीनी अधिग्रहण से बचने के लिए अपने यहां के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) नियमों को सख्त बनाया है.

खबरों के अनुसार, चीन कोरोना के कहर से पस्त दुनिया की इकोनॉमी का फायदा उठाते हुए कई देशों की कंपनियों में हिस्सेदारी बढ़ाने में लग गया है. भारत सहित कई देश चीन की दिग्गज सार्वजनिक कंपनियों के अपने यहां बढ़ते निवेश को रोकने की कोशिश में लग गए हैं.

यूरोपीय संघ

सबसे पहले यूरोपीय संघ ने अपने एफडीआई नियमों में बदलाव किया. यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों ने चीन के 'बारगेन हंटिंग' को रोकने के लिए विदेशी निवेश पर अंकुश वाले नियम लाए. जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन सहित कई देशों ने इसे अपनाया.

25 मार्च को ही यूरोपीय संघ ने अपने सदस्य देशों को चेतावनी दी थी कि एफडीआई के द्वारा खासकर हेल्थकेयर या इससे जुड़ी इंडस्ट्री में अधिग्रहण का खतरा बढ़ गया है. इसने सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे एफडीआई की स्क्रीनिंग की व्यवस्था बनाएं.

इसके बाद जर्मनी की एंजेला मर्केल सरकार ने इस तरह का नियम बनाया जिससे वहां के हितों की रक्षा की जा सके. 17 मार्च को ही स्पेन की सरकार ने अपने 2003 के एक्ट में बदलाव करते हुए एफडीआई या किसी एफडीआई प्रस्ताव के लिए सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी कर दी थी.

इटली ने 8 अप्रैल, 2020 को एक 'गोल्डेन पावर लॉ' पेश किया जिसके मुताबिक संवेदनशील क्षेत्रों में विदेशी निवेश पर कई तरह के अंकुश लगने हैं. इटली सरकार को इस बात का डर था कि उसकी खस्ताहाल कंपनियों को सस्ती कीमत पर विदेशी कंपनियां खरीद सकती हैं. गौरतलब है कि इटली कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से है.

ऑस्ट्रेलिया

30 मार्च को ऑस्ट्रेलिया ने भी विदेशी अधिग्रहण के नियमों को अस्थायी रूप से सख्त कर दिया. उसे भी डर था कि कोरोना संकट को देखते हुए उसकी महत्वपूर्ण कंपनियों को विदेशी कंपनियां सस्ते में खरीद सकती हैं. वहां के सांसदों ने चेताया था कि एविएशन, हेल्थ आदि कई सेक्टर की परेशान कंपनियों को चीन जैसे देशों की सरकारी कंपनियां खरीद सकती हैं.

कनाडा

18 अप्रैल, 2020 को कनाडा ने भी अपने विदेशी निवेश नियम को सख्त बना दिया. अब कनाडा की जन स्वास्थ्य या अन्य महत्वपूर्ण सप्लाई चेन से जुड़ी कंपनी में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को सरकारी जांच से गुजरना होगा.

ब्रिटेन

इसी तरह, ब्रिटेन में सैन्य, कंप्यूटर हार्डवेयर, क्वांटम टेक्नोलॉजी आदि में अधिग्रहण बिना सरकारी मंजूरी के अब नहीं हो सकती.

अमेरिका

अमेरिका में विदेशी कंपनियों द्वारा किसी भी संभावित खरीद की जांच के लिए विदेशी निवेश समिति (CFIUS) सक्रिय भूमिका निभा रही है. राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर इसकी जांच की जाती है.

भारत

इस सूची में सबसे नया नाम भारत का है. भारत सरकार ने 17 अप्रैल को एफडीआई नियमों में बदलाव करते हुए कहा कि 'मौजूदा कोविड—19 महामारी के दौर में भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण/खरीद पर अंकुश के लिए ऐसा किया जा रहा है.'

चीन या किसी देश का नाम लिए बिना भारत ने अपने एफडीआई नियम में बदलाव करते हुए कहा, 'ऐसा देश जिसकी स्थल सीमा भारत से लगती हो, वहां की कंपनी भारत में बिना सरकारी मंजूरी के निवेश नहीं कर सकती. अगर किसी निवेश का लाभार्थी व्यक्ति किसी ऐसे देश में रहता हो या उस देश का नागरिक हो तो भी यही नियम लागू होगा'

इसके अलावा सरकार ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए चीन की कंपनियों द्वारा अप्रत्यक्ष अधिग्रहण पर भी रोक लगा दी है. यानी अब किसी विदेशी निवेश के स्वामित्व में यदि कोई भी बदलाव होता है तो इसके ​लिए सरकार से मंजूरी लेनी होगी. अब चीन से आने वाले प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी तरह के निवेश के लिए सरकार से मंजूरी लेनी होगी.

इसके पहले सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की कंपनियों को ही निवेश के लिए भारत सरकार की मंजूरी लेनी होती थी. चीन का कहना है कि अब चीन की कंपनियों के लिए भारत में निवेश कठिन हो जाएगा.

भारत क्यों हुआ मजबूर

असल में इसके पहले ऐसी खबर आई कि पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (PBoC) ने भारत की सबसे बड़ी गैर बैंंकिंग होम लोन कंपनी एचडीएफसी में अपनी हिस्सेदारी 0.8 फीसदी से बढ़ाकर 1.01 फीसदी कर ली है. यह खबर इस लिहाज से चकित करने वाली थी कि जब दुनिया अपने सबसे बड़े आर्थिक संकट से गुजर रही है, चीन की कंपनियां खरीदारी में लगी हैं.

भारत में कितना है चीन का निवेश

गौरतलब है कि दिसंबर 2019 तक चीनी कंपनियों ने भारत में 8 अरब डॉलर (करीब 61 हजार करोड़ रुपये) का निवेश कर रखा था. यह निवेश मुख्य रूप से मोबाइल फोन, इलेक्ट्रि​क अप्लायंसेज, इन्फ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोबाइल में हुआ है. चीन के शेयर बाजारों में लिस्टेड करीब 2000 कंपनियों में से 80 फीसदी सरकारी क्षेत्र की हैं.