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आपराधिक रिकार्ड वाले प्रत्याशी नहीं लड़ पाएंगे चुनाव, EC नियमों में जल्द करेगा बदलाव


सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद चुनाव आयोग ने कहा कि वह राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के सर्वोच्च अदालत के आदेश का खुले दिल से स्वागत करता है. दागी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के संबंध में कहा कि चुनाव में उतरे उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड पर जल्द मौजूदा नियमों में बदलाव किए जाएंगे. आयोग ने आश्वासन दिया कि वह चुनावी लोकतंत्र में सुधार के लिए नए नैतिक मापदंड तैयार करेगा.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए चुनाव आयोग ने शुक्रवार को कहा है कि वह पूरे दिल से इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत करता है. साथ ही वह चुनावी लोकतंत्र की बेहतरी के लिए नए नैतिक मापदंड करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेगा और ऐसे कदम उठाएगा जो दूरगामी होंगे.

आयोग ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए मतदाताओं की जानकारी के लिए उम्मीदवारों और संबंधित राजनीतिक दलों के सदस्यों पर दर्ज आपराधिक मामलों के प्रचार को सुनिश्चित करने के लिए 10 अक्टूबर 2018 के निर्देशों में बदलाव करेगा. कोर्ट ने दागी उम्मीदवारों के आपराधिक आंकड़ों की जानकारी चुनाव आयोग को देने का निर्देश दिया था.

अक्टूबर 2018 में चुनाव आयोग ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए आदेश दिया था कि वो अपने ऊपर दर्ज आपराधिक मामले का विज्ञापन चुनाव के दौरान कम से कम तीन बार टेलीविजन और अखबारों में प्रकाशित और प्रसारित कराएं. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया था कि उम्मीदवारों को अपने आपराधिक मामले को टीवी व अखबारों में विज्ञापन देने का खर्च स्वयं वहन करना होगा क्योंकि यह चुनावी खर्च की श्रेणी में आता है.

कोर्ट ने दलों को दिए थे निर्देश

भारतीय राजनीति के अपराधीकरण को खत्म करने के लिए विगत गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए सभी राजनीतिक दलों से कहा था कि वह अपनी वेबसाइटों, अखबारों और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का ब्योरा दें. साथ ही यह भी बताएं कि आपराधिक रिकार्ड वाले उम्मीदवार को पार्टी ने क्यों चुना और बिना आपराधिक रिकार्ड वाले किसी पार्टी सदस्य को टिकट क्यों नहीं दिया.

लंबित मामले में लड़ सकते हैं चुनाव

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा-आठ दोषी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है, लेकिन ऐसे नेता जिन पर सिर्फ मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं. भले ही उन पर लगे आरोप गंभीर क्यों न हों. इस अधिनियम की धारा 8(3) के मुताबिक किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी भी विधायी सदस्य को यदि दो वर्ष से अधिक की कैद की सजा सुनाई जाती है, तो उसे दोषी ठहराए जाने की तिथि से अयोग्य माना जाएगा. ऐसे लोग सजा पूरी होने की तारीख से छह वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकते.