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सेमीफाइनल में दुश्मनों से नहीं गिला, दोस्त ही निकले बेवफा


बिहार में छह सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने एक साथ कई चीजें साफ कर दीं हैं. पहला यह कि राष्‍ट्रीय जनता दल (RJD) का मुस्लिम-यादव समीकरण (MY equation) अब सुरक्षित नहीं रहा. दूसरा, मुस्लिम वोट पर अब सिर्फ आरजेडी-कांग्रेस की ही ठेकेदारी नहीं चलेगी। ...और आखिरी यह कि सियासी समर में दोस्तों ने भी कम बेवफाई नहीं की. दोनों गठबंधनों के घटक दलों के वोट सहयोगी दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में ट्रांसफर नहीं हो सके.

उधर, छह में से चार सीटों पर राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की हार के पीछे सबसे बड़ी वजह भी दोस्ती में कुश्ती है. महागठबंधन (Grand Alliance) पर भी इसका असर पड़ा. तकरार के कारण नुकसान तो हुआ, लेकिन आरजेडी को सुकून हो सकता है कि उसके खाते में दो सीटें आ गईं. हालांकि, कांग्रेस (Congress) अपनी एक सीट भी नहीं बचा पाई.

केवल समस्‍तीपुर में दिखी एनडीए की एकजुटता

समस्तीपुर संसदीय सीट (Samastipur Lok Sabha Seat) को अगर अपवाद मान लिया जाए तो नतीजे बता रहे हैं कि दोनों गठबंधनों के घटक दलों के वोटर और समर्थक साथी दलों को सहयोग नहीं कर पाए. समस्तीपुर में लोक जनश्‍ाक्ति पार्टी (LJP) प्रत्याशी के पक्ष में एनडीए शुरू से ही एकजुट था। किंतु अन्य सीटों पर ऐसी बात नहीं थी. दरौंदा नजीर है, जहां भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बागी प्रत्याशी कर्णवीर सिंह उर्फ व्यास सिंह (Karnveer Singh alias Vayas Singh) ने जता दिया कि जनता दल यूनाइटेड (JDU) और बीजेपी के समर्थक पहले की तरह सहज नहीं हैं. मिशन 2020 में वोट ट्रांसफर कराने के लिए दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को एक दिखना पड़ेगा.

किशनगंज में बीजेपी ने अंतिम दम तक किया संघर्ष

विधानसभा की सिर्फ एक किशनगंज सीट (Kishanghaj Assembly Seat) पर लड़ रही बीजेपी ने अंतिम दम तक संघर्ष किया. हालात विपरीत थे। फिर भी पिछले चुनाव की तुलना में बीजेपी प्रत्याशी स्वीटी सिंह (Sweety Singh) को ज्यादा वोट आए. किशनगंज में कांग्रेस को भी आरजेडी के माय समीकरण का फायदा नहीं मिला.

एनडीए को भुगतना पड़ा तनातनी का खामियाजा

पटना में जलजमाव (Waterlogging) के मुद्दे पर उपचुनाव के पहले बीजेपी-जेडीयू की तनातनी सबके सामने आ गई थी. दोनों दलों के नेताओं में खूब बयानबाजी भी हुई थी. संदेश कार्यकर्ताओं तक भी गया। माना जा रहा है कि जेडीयू पर यही उल्टा पड़ गया। हालांकि, मतदान से दो दिन पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह (Amit Shah) ने नीतीश कुमार (Nitish Kumar) को बिहार में एनडीए का नेता बताकर मामले को काफी हद तक सकारात्मक कर दिया था, किंतु तबतक बहुत देर हो चुकी थी.

जेडीयू की सीटों पर बीजेपी समर्थकों ने नहीं दिया साथ

जेडीयू के हिस्से में आई सभी चार सीटों पर बीजेपी के समर्थकों ने तन-मन से साथ नहीं दिया. जेडीयू को पराया मान लिया. दरौंदा (Daraunda) उदाहरण है, जहां बीजेपी नेता कर्णवीर सिंह ने बगावत कर निर्दलीय ताल ठोक दी और बीजेपी कार्यकर्ताओं ने उनका साथ दिया। नतीजा हुआ कि जेडीयू का अधिकृत प्रत्याशी हार गया। बीजेपी के बागी प्रत्याशी व्यास सिंह को जेडीयू से दोगुना वोट मिला. नाथनगर (Nath Nagar) और बेलहर (Belhaar) में भी जेडीयू को बीजेपी का साथ नहीं मिला। हालांकि, नाथनगर सीट किसी तरह जेडीयू के कब्जे में आ गई.

मांझी-सहनी ने खुद को आजमा लिया

सीटों में अधिकतम हिस्सेदारी के लिए अगर महागठबंधन में तकरार नहीं होता तो एनडीए के खाते में एक सीट और आ जाती. नाथनगर में 960 वोट से आरजेडी प्रत्याशी की हार हो गई, जबकि हिंदुस्‍तापी आवाम मोर्चा (HAM) के प्रत्याशी को छह हजार वोट आए. जाहिर है, जीतनराम मांझी (Jitan Ram Manjhi) ने अगर जिद न की होती तो जेडीयू को एकमात्र सीट भी नसीब नहीं होती.

सेमीफाइनल' में आरजेडी को मिली बड़ी सफलता

बहरहाल, आगामी विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल में सबसे बड़ी सफलता आरजेडी को मिली. जिन चार सीटों पर उसने प्रत्याशी उतारा था, उनमें एक भी उसके खाते की नहीं थी. तेजस्वी (Tejashwi Yadav) ) के नेतृत्व में तीन सीटों पर आरजेडी ने बेहतर प्रदर्शन किया। दो जीत भी ली। सिमरी बख्तियारपुर (Simri Bakhtiyarpur) और बेलहर में आरजेडी ने बड़े अंतर से जेडीयू को हराया. दरौंदा पर प्रत्याशी चयन में सावधानी बरती जाती तो नतीजा बेहतर आ सकता था.