सबौर(भागलपुर):विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के मृदा विज्ञान विभाग द्वारा भारतीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग योजना सोसायटी (ISSLUP), सबौर चैप्टर के सहयोग से “बिहार में उर्वरक खपत को कम करने की रणनीतियाँ” विषय पर एक विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य कृषि उत्पादकता को बनाए रखते हुए उर्वरकों की खपत कम करने हेतु वैज्ञानिक, तकनीकी, जैविक एवं नीतिगत उपायों पर विचार-विमर्श करना था।
यह कार्यक्रम डॉ. डी. आर. सिंह, माननीय कुलपति, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के संरक्षण में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं संचालन डॉ. अंशुमान कोहली, अध्यक्ष, मृदा विज्ञान विभाग ने किया। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. वाई. के. सिंह, अध्यक्ष, ISSLUP सबौर चैप्टर एवं डॉ. ए. के. झा., प्रोफेसर, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन विभाग थे। सह-संयोजक के रूप में डॉ. सुनील कुमार एवं डॉ. श्वेता शाम्भवी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आयोजन सचिव डॉ. अनुपम दास तथा सह-आयोजन सचिव डॉ. इंगल एस. एन., डॉ. भबानी प्रसाद मंडल एवं डॉ. सरोज कुमार यादव ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में योगदान दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ माननीय कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह द्वारा पौधारोपण के साथ हुआ, जो पर्यावरण संरक्षण एवं सतत कृषि के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता का प्रतीक रहा। इस अवसर पर बिहार कृषि महाविद्यालय (BAC), सबौर तथा कृषि जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय (CABT), सबौर के राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों ने अपने कार्यक्रम पदाधिकारियों एवं समन्वयकों के साथ सक्रिय भागीदारी निभाई। स्वयंसेवकों ने पौधारोपण अभियान में सहयोग करते हुए पर्यावरण संरक्षण एवं हरित बिहार के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। इसके पश्चात अतिथियों का स्वागत एवं समूह छायाचित्र कार्यक्रम आयोजित किया गया।
स्वागत भाषण में डॉ. अंशुमान कोहली ने बढ़ती उर्वरक लागत, घटती पोषक तत्व उपयोग दक्षता तथा पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य वक्ता डॉ. बिजय सिंह ने उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन, मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक अनुशंसा तथा प्रिसिजन न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। अपने संबोधन में कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने बिहार में कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने हेतु वैज्ञानिक एवं टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन रणनीतियों को अपनाने पर जोर दिया।
तकनीकी सत्र में विभिन्न विशेषज्ञों ने उर्वरक खपत कम करने से जुड़े विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रो. वी. पी. रमणी ने प्राकृतिक खेती एवं पोषक तत्व पुनर्चक्रण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। डॉ. सत्येन्द्र कनौजिया ने “मिट्टी की मुस्कान” अवधारणा के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य सुधार एवं कम लागत वाले जैविक विकल्पों पर चर्चा की। डॉ. संजय अरोड़ा ने सूक्ष्मजीव आधारित इनोकुलेंट्स की भूमिका को रेखांकित किया, जो पोषक तत्व उपलब्धता बढ़ाने एवं उर्वरक आवश्यकता कम करने में सहायक हैं।
उद्योग जगत का प्रतिनिधित्व करते हुए श्री मुकेश मोहन मिश्रा ने उर्वरक आपूर्ति, वितरण एवं संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर विचार व्यक्त किए। डॉ. महेश घाटाला ने संसाधन उपयोग दक्षता बढ़ाने वाले टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. शंकर झा ने संतुलित उर्वरक उपयोग को सतत कृषि का आधार बताया। डॉ. ए. के. झा. ने समृद्ध वर्मी-कम्पोस्ट के माध्यम से यूरिया पर निर्भरता कम करने की संभावनाएं प्रस्तुत कीं।
आधुनिक तकनीकों पर चर्चा करते हुए श्री राहुल कुमार ने ड्रोन एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पोषक तत्व निगरानी एवं प्रिसिजन उर्वरक प्रबंधन का प्रदर्शन किया। डॉ. सरोज कुमार यादव ने पीजीपीआर (Plant Growth Promoting Rhizobacteria) की भूमिका पर प्रकाश डाला, जबकि डॉ. इंगल सागर नंदुलाल ने पोषक तत्वों की कमी वाले क्षेत्रों की पहचान हेतु भू-स्थानिक तकनीकों के उपयोग को रेखांकित किया। डॉ. भबानी प्रसाद मंडल ने स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित मृदा उर्वरता निदान तकनीक को त्वरित, कम लागत एवं सटीक उर्वरक अनुशंसा का प्रभावी माध्यम बताया।
विचार-विमर्श के दौरान प्रतिभागियों ने बिहार में उर्वरक खपत कम करने के लिए व्यावहारिक रणनीतियों पर चर्चा की तथा भविष्य की नीति निर्माण प्रक्रिया हेतु महत्वपूर्ण सुझाव दिए। विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला कि बेहतर पोषक तत्व प्रबंधन अपनाकर बिहार में 20 से 40 प्रतिशत तक रासायनिक उर्वरकों की खपत कम की जा सकती है, जबकि फसल उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सभी प्रतिभागियों ने एकमत से कहा कि जैविक उपायों, प्रिसिजन कृषि, भू-स्थानिक तकनीकों, स्पेक्ट्रोस्कोपी आधारित मृदा परीक्षण एवं अनुकूल नीतिगत हस्तक्षेपों के समन्वित उपयोग से उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाई जा सकती है, मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सकता है तथा कृषि उत्पादन लागत को कम किया जा सकता है। कार्यक्रम से प्राप्त सुझाव बिहार में सतत पोषक तत्व प्रबंधन संबंधी भविष्य की नीतियों एवं कार्ययोजनाओं के निर्माण में सहायक होंगे।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ तथा सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों, NSS स्वयंसेवकों, आयोजकों एवं हितधारकों के योगदान की सराहना की गई।

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