वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून!


बिस्मिल अज़ीमाबादी जी ने 'सरफ़रोशी की तमन्ना' में क्या शानदार शब्द पिरोये हैं -'...वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून,तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,हाथ जिन में हो जुनूँ कटते नहीं तलवार से,सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है...!' जैसे ही 26 जुलाई का दिन आता है तो ऐसे ही विचार हरेक मन में कौंधने लगते हैं, क्यों कि 26 जुलाई का दिन भारत के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है, क्योंकि इसी दिन वर्ष 1999 में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों को कारगिल से खदेड़कर दुर्गम व अति कठिन चौकियों पर अपनी जीत का परचम फहराया था। 

वास्तव में यह दिन बलिदानियों/हमारे देश के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने, उनके देश के लिए दिए गए बलिदान को याद करने का दिन है। यह दिन हमारे देश के अमर जवानों द्वारा अपने प्राणों की आहुति देकर देश की आन-बान और शान की रक्षा करने की याद दिलाता है। सच तो यह है कि कारगिल दिवस हमारे देश के जवानों के दुर्गम व अति कठिन पहाड़ी क्षेत्र में 18000 फीट की ऊंचाई पर पराक्रम और शौर्य की कहानी कहता है। इस वर्ष 26 जुलाई, 2023 को हम कारगिल विजय दिवस की 24 वीं वर्षगाँठ मनाने जा रहे हैं। दरअसल,वर्ष 1998 में भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों ने परमाणु परीक्षण किये थे, जिससे तनाव और बढ़ गया तथा अंत में वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध हुआ। 

जानकारी देना चाहूंगा कि वर्ष 1999 के मई-जुलाई के बीच जम्मू और कश्मीर के कारगिल (अब लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश में एक ज़िला) ज़िले में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर लड़ा गया था जिसमें भारत को जीत मिली थी। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि पाकिस्तानी सैनिकों ने ऑपरेशन बद्र के तहत नियंत्रण रेखा (एलओसी) के भारतीय पक्ष की ओर घुसपैठ करना शुरू कर दिया। पाकिस्तान को इस बात की पूरी उम्मीद थी कि वह सियाचिन में भारतीय सैनिकों को पराजित कर देगा लेकिन भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू करके इसका माकूल व जोरदार जवाब दिया। जानकारी देना चाहूंगा कि 3 मई, 1999 को पाकिस्तान ने यह युद्ध तब शुरू किया था, जब उसने लगभग 5,000 सैनिकों के साथ कारगिल के चट्टानी, अति दुर्गम , कठिन पहाड़ी क्षेत्र में उच्च ऊँचाई पर घुसपैठ की और उस पर कब्ज़ा जमा लिया। जब भारत सरकार को पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ की जानकारी मिली तो भारतीय सेना द्वारा भारतीय क्षेत्र पर कब्ज़ा करने वाले घुसपैठियों को वापस खदेड़ने के लिये 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया गया था। यहां पाठकों को यह जानकारी देना चाहूंगा कि सर्वप्रथम 3 मई 1999 को एक स्थानीय चरवाहा अपने नए याक की खोज में कारगिल के पहाड़ी क्षेत्र में इधर-उधर घूम रहा था तभी उसने वहां कई हथियारबंद पाकिस्तानी सैनिकों को देखा था और उसी चरवाहे ने सेना के अधिकारियों को पाकिस्तान की घुसपैठ के बारे में जानकारी दी थी। 

डीएनए इंडिया में छपी एक खबर से यह जानकारी मिलती है कि इसके बाद 5 मई के दिन इलाके में घुसपैठ की खबरों के जवाब में भारतीय सेना के जवानों को वहां भेजा गया और इस दौरान पांच भारतीय सैनिक शहीद हो गए। कुछ दिन बाद तक पाकिस्तानी सैनिक अच्छी खासी संख्या में (पांच हजार के लगभग) कारगिल पहुंच चुके थे। इसके बाद 9 मई 1999 को उनकी तरफ से भारतीय सेना के गोला-बारूद डिपो को निशाना बनाते हुए भारी गोलाबारी की गई तथा 10 मई तक वे लाइन आप कंट्रोल (एल ओ सी )के पार द्रास और काकसर सेक्टरों सहित जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों में घुसपैठ कर चुके थे। इसके बाद भारतीय सेना द्वारा 'आपरेशन विजय' चलाया गया। जानकारी देना चाहूंगा कि 26 मई को भारतीय वायुसेना  ने जवाबी कार्रवाई करते हुए घुसपैठियों पर हवाई हमले शुरू किए। वहीं 1 जून को पाकिस्तानी सेना ने हमलों की रफ्तार तेज कर नेशनल हाइवे 1 को निशाना बनाया। हालांकि, भारतीय वीरों ने अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करते हुए 9 जून तक जम्मू-कश्मीर के बटालिक सेक्टर में दो प्रमुख चोटियों पर दोबारा कब्जा कर लिया था।13 जून को टोलोलिंग चोटी पर भी फिर से कब्जा कर लिया गया। जानकारी देना चाहूंगा कि भारतीय सेना 20 जून तक टाइगर हिल के आसपास के ठिकानों और फिर 4 जुलाई तक टाइगर हिल पर भी अपना कब्जा जमा चुकी थी। इसी बीच फ्रांस और अमेरिका जैसे देश भारत के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा चुके थे। यहां उल्लेखनीय है कि 5 जून को भारत की ओर से दस्तावेज भी जारी किए गए जिनके द्वारा पाकिस्तानी सेना का हमले में हाथ होने का खुलासा भारत की ओर से किया गया। इसके बाद, 14 जुलाई 1999 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा सेना के 'ऑपरेशन विजय' के सफलतापूर्वक पूरा होने का ऐलान किया गया और 26 जुलाई को पाकिस्तानी सेना के घुसपैठ वाली सभी चोटियों को फिर से अपने कब्जे में लेकर भारत इस युद्ध में विजयी हुआ। 

यहां पाठकों को यह जानकारी भी देता चलूं कि वर्ष 2019 में इंडिया गेट से लगभग 400 मीटर की दूरी पर एक राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनाया गया है, जो क्रमशः 1962 में भारत-चीन युद्ध, वर्ष1947, 1965 और 1971 में भारत-पाक युद्ध, श्रीलंका में भारतीय शांति सेना संचालन (1987-90) तथा वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के उन सैनिकों, जवानों को समर्पित है जिन्होंने देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक उन सैनिकों को भी याद करता है, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन, मानवीय सहायता आपदा राहत संचालन, आतंकवाद विरोधी अभियान में भाग लिया और सर्वोच्च बलिदान दिया। बहरहाल, कहना चाहूंगा कि वर्ष 1971 के युद्ध में मुंह की खाने के बाद लगातार छेड़े गए छद्म युद्ध के रूप में पाकिस्तान ने ऐसा ही छ्द्म हमला कारगिल में वर्ष 1999 में किया था और मुंह की खाई। एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक के अनुसार18 हजार फीट की ऊंचाई पर कारगिल का यह युद्ध तकरीबन दो माह तक चला, जिसमें 527  वीर सैनिकों की शहादत देश को देनी पड़ी। 1300 से ज्यादा सैनिक इस जंग में घायल हुए। पाकिस्तान के लगभग 1000 से 1200 सैनिकों की इस जंग में मौत हुई। भारत के कैप्टन विक्रम बत्रा (15 अगस्त 1999, परमवीर चक्र विजेता), बिलासपुर के संजय कुमार (परमवीर चक्र विजेता), वीर सैनिक डोला राम(कुल्लू जिला), ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर( तोलोलिंग व सबसे ऊंची चोटी टाइगर हिल पर विजय पताका फहराने वाले), 18 ग्रेनेडियर्स, राजपूताना राइफल्स, हिमाचल प्रदेश के कैप्टन सौरभ कालिया को आखिर कौन भूल सकता है? जानकारी देना चाहूंगा कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने 18 ग्रेनेडियर्ज को 52 वीरता सम्मानों से सम्मानित किया, यह हम सभी भारतीयों को सदैव गौरवान्वित करता रहेगा।इसी कमान के ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को मात्र 19 वर्ष की आयु में परमवीर चक्र से नवाजा गया। 

अंत में, यही कहूंगा कि विजय दिवस एक दिवस मात्र ही नहीं यह हम सभी देशवासियों के लिए प्रेरणा दिवस भी है। भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस व शौर्य व दृढ़ता से जिस तरह कारगिल युद्ध में दुश्मन को खदेड़ा, उस पर हर देशवासी को गर्व है। हमें फक्र है देश के समस्त जाबांजों पर, सैनिकों पर जिन्होंने अपनी जान तनिक भी परवाह न करते हुए देश की रक्षा में अपना अभूतपूर्व, अमूल्य योगदान दिया। हमारे देश के वीर शहीदों को कोटि कोटि नमन, उनके देशभक्ति, देशप्रेम के जज्बे को तहेदिल से सैल्यूट। जय जय जवान, जय जय भारत ! जय हिंद देश की माटी!

सुनील कुमार महला
(फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड)

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