तालिबान के प्रतिनिधित्व की समीक्षा करेगी संयुक्त राष्ट्र समिति, नए दूत को स्वीकृति देने की गुहार

संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान के प्रतिनिधित्व को लेकर संयुक्त राष्ट्र समिति नवंबर में समीक्षा करेगी। महासभा के अध्यक्ष ने कहा है कि विश्व निकाय में काबुल की सीट पर किसे बैठना चाहिए, इस पर समिति द्वारा अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करने के बाद मामले पर निर्णय लिया जाएगा। 193 देशों में से म्यांमार और अफगानिस्तान को हाल ही में संपन्न उच्च स्तरीय यूएनजीए में बोलने का मौका नहीं मिला था।

तालिबान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मंच पाने के लिए छटपटा रहा है। उसने अपने प्रवक्ता सुहैल शाहीन को यूएन के लिए अफगानिस्तान का नया दूत नामित किया है। लेकिन उन्हें अफगानिस्तान के प्रतिनिधि के तौर पर स्वीकृति नहीं मिली है। शाहीन ने संयुक्त राष्ट्र से फिर गुहार लगाई है कि उन्हें इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी जाए। शाहीन ने यूएन से अपने आग्रह में कहा है कि अफगानिस्तान की पूर्ववर्ती सरकार की ओर से नियुक्त दूत देश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। क्योंकि इस सरकार का अब अस्तित्व नहीं है।

पूर्व की अफगान सरकार के दौरान गुलाम इसाकजई संयुक्त राष्ट्र में अफगानिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि थे। 15 अगस्त को तालिबान द्वारा काबुल पर नियंत्रण करने के बाद देश छोड़कर भाग गए अशरफ गनी ने जून 2021 में इसाकजई को संयुक्त राष्ट्र में काबुल का दूत नियुक्त किया था। 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च स्तरीय 76वें सत्र के अंतिम दिन उन्हें देश के लिए बोलने के लिए सूचीबद्ध भी किया गया था। हालांकि, इसाकजई ने अपनी भागीदारी वापस ले ली थी।

इससे पहले तालिबान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में अपने दूत को हिस्सा लेने की अनुमति देने का आग्रह किया था। इसके लिए तालिबान ने संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतेरस को पत्र लिखा था। हालांकि 21 से 27 सितंबर तक चले महासभा के सत्र में तालिबान के दूत को हिस्सा लेने की अनुमति नहीं मिली थी। पाकिस्तान ने भी तालिबान दूत को मौका दिए जाने को लेकर संयुक्त राष्ट्र में अभियान चलाया था, लेकिन उसे नाकामी हाथ लगी थी। बता दें कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को अभी तक किसी देश ने मान्यता नहीं दी है।