'कई हैं ऐसे सवाल, जिनका जवाब मांग रहा बंगाल'


प्रधान सम्पादक सुधांशु शेखर की टिप्पणी - सन्दर्भ: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम

मोदीमय नहीं, ममतामय हुआ बंगाल. बंगाली अस्मिता की फिर संरक्षक बनीं दीदी, वही दीदी जिनका प्रधानमंत्री मोदी ने उपहासजनक स्वर में दीदी ओ दीदी कहकर अपमान किया और आज स्वयं उपहास के पात्र बन गये क्योंकि उन्होंने न केवल जीत का दावा किया था बल्कि रैलियों में बार-बार कहा था, दो मई, दीदी गयीं. पश्चिम बंगाल में दीदी की यह जीत एकनायकवाद पर लोकतंत्र की जीत का उत्सव है, घृणा की राजनीति पर सहभागिता, सद्भाव की जीत है, अहंकार पर विनम्रता की जीत है, कट्टरवाद के विरुद्ध दृढ़ संकल्प मुहिम की जीत है, विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ सतत संघर्ष की जीत है, दशकों से समय की कसौटी पर खरी उतरी सुदृढ़ भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा की जीत है, ध्रुवीकरण के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की जीत है, राजनीतिक कुशाग्रता की बानगी है. यह जीत मात्र एक राज्य में सत्ता के तीव्रतम लड़ाई में कुशल रणनीति और कभी हार नहीं मानने की अजेय मनोवृत्ति की जीत नहीं, बल्कि विश्व के सामने यह प्रमाणित करने वाली जीत भी है कि भारतीय लोकतंत्र की मर्यादा अक्षुण्ण है क्योंकि हाल के दिनों में लोकतंत्र के प्रति हमारी आस्था पर उंगलियां उठ रही थीं और कहा जा रहा था कि हम धर्मनिरपेक्षता के पथ से डिग रहे हैं.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की यह पराजय अनहद हेकड़ी, विपक्ष पर तंज कसने की निंदनीय प्रवणता, ममता पर व्यक्तिगत अशोभनीय टिप्पणियां, लोकतंत्र के प्रति उपेक्षाभाव, सत्ता का अहंकार, जमीनी हकीकत से दूर पांचतारा होटलों में बैठकर राजनीति करना, रणनीति तैयार करना, कोरोना की महामारी के बीच भी जनता के जीवन से खिलवाड़ कर भारी भीड़ जुटाकर अपनी छवि चमकाने की प्रवृत्ति तथा एको अहम् द्वितीयो नास्ति (एक मैं ही हूँ दूसरा कोई नहीं.) का अहंकार की हार है. चुनाव की घोषणा के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों से कहा था, मैंने जब लोकसभा चुनाव में 22 सीटें जीतने की बात कही थी तब आपने मेरा मजाक उड़ाया था, आप हंस रहे थे. आज जब मैं 200 सीटें जीतने की बात कर रहा हूं तब आप खामोश हैं क्योंकि आज मेरे हंसने की बारी है. हम 200 से अधिक सीटें जीतेंगे, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी हर चुनावी रैली में कहते, 2 मई, दीदी गयीं. ममता दीदी ने अपनी हार स्वीकार कर ली है और इसी कारण हमारे खिलाफ गलतबयानी, अनर्गल प्रलाप कर रही हैं. यह देश के उन दो महान नेताओं का अहंकार बोल रहा था जिन पर देश की जनता ने अपना विश्वास जताया है. बंगाल की जनता ने कुटिल षड्यत्रों के महाजाल को काटकर बंगाल की अस्मिता की रक्षा की है, यह जीत उसकी प्रतिध्वनि है. राज्य की सात करोड़ जनता ने ममता में विश्वास जताकर एक बार फिर यह प्रमाणित किया है कि उसका भाग्य किसी बड़बोले नेता के हाथ में नहीं, एक असीम साहसी महिला के हाथ में सुरक्षित है. भाजपा की चुनौती को जब ममता ने स्वीकार किया तब भाजपा ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ममता की रणनीति अद्भुत नतीजे में परिवर्तित होगी. अनमनीय ममता, आद्यांत स्ट्रीट फाइटर ममता, अप्रतिद्वंद्वी अग्निकन्या ममता, प्रतिपक्ष के खेमे में घुसकर लड़ाई लड़ने में दक्ष ममता, देश की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री ममता आज न केवल बंगाल की सर्वाधिक गौरवोज्ज्वल चेहरा हैं अपितु देश के लिए एक अनोखा उदाहरण पेश किया है कि यदि लड़ने की दृढ़ मनोवृत्ति हो, अदम्य साहस हो तो मोदी-शाह और उनकी पूरी टोली को धूल चटाया जा सकता है. आज वे देश में एक कुशल नेता के रूप में समादृत हैं. उन्होंने भाजपा के अड़ियलपन, दंभ, अहंकार, कुटिलता, एकनायकवाद पर जो करारी चोट की है, उससे भाजपा को उबरने में समय लगेगा और यदि वह भारतीय राजनीति में अपने वर्तमान वर्चस्व को कायम रखना चाहती है तो उसे अपनी नीतियों, रणनीतियों, चाल-चलन, व्यवहार, दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन करना होगा. ममता इस जीत के साथ ही भारतीय राजनीति में पथप्रदर्शक बन गयी है. आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक भूमिका एक नये आयाम ले सकती है.

दो मई को दोपहर होते ही राज्य के हर गली मोहल्ले में खेला होबे गाना बजने लगा. विजय की यह गाथा 2011 में शुरू हुई. 2016, 2021 में भी अबाध रही. सत्ता की हैट्रिक. उसके पूर्व भी प्रायः ढाई दशकों का इतिहास उनके सतत संघर्ष का ही इतिहास है. इस संघर्ष के मील के पत्थर हैं, 21 जुलाई, नेताई, नानुर, बानतला, सिंगुर तथा नंदीग्राम जैसे आंदोलन, जिन्होंने तीन दशकों से अधिक समय के वाम शासन को उखाड़ फेंका था. इस बार की लड़ाई कई अर्थों में खास थी. आरएसएस और भाजपा की सम्मिलित ताकत ने राज्य के राजनीतिक संरचना को ही नष्ट करने पर आमादा थी. राज्य के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को समाप्त कर समाज को हिन्दु-मुस्लिम तबके में विभाजित करने की कुटिल राजनीति-रणनीति अपनायी गयी. धनबल का भी नंगा खेल खेला गया. वोट देने के बाद 1000 रुपये देने वाला कूपन भी सामने आया. 

तरह-तरह के हथकंडे: प्रधानमंत्री मोदी तथा वर्तमान भारतीय राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने ममता को परास्त करने के तरह-तरह के हथकंडे अपनाये. ईली, आयकर विभाग, सीबीआई आदि केंद्रीय एजेंसियों को मोर्चे पर लगाया गया. भय, मामले चलाने, छापे आदि से कतिपय राजनेताओं का भयादोहन किया गया, उन्हें तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने का प्रलोभन दिया गया, कुछ बहती गंगा में हाथ धोने चले आये, कुछ व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के चक्कर में सर्वस्व गंवा बैठे. मतदाताओं को भी घोषणापत्र के माध्यम से लुभाने की भरपूर चेष्टा की गयी लेकिन बंगाल के मतदाता जुमलों के मकड़जाल में नहीं उलझे. किसानों को प्रति वर्ष छह हजार देने के साथ ही पिछले तीन सालों का बकाया 18,000 रुपये देने का वादा भी किया गया नौकरियों के भी वादे थे. सारी जनहितकारी केंद्रीय योजनाओं का झुनझुना भी जोरशोर से बजाया गया लेकिन प्रबुद्ध मतदाता भाजपा के जुमले और हकीकत से बखूबी वाकिफ है. उसे भ्रमित करना सहज नहीं है.

न घर के रहे न घाट के: इस चुनाव ने बंगाल के मतदाताओं की परिपक्वता को प्रमाणित किया है और यह सिद्ध किया है कि वे चेहरे, चाल, चरित्र, महत्वाकांक्षा, स्वार्थपरता, सत्ता लोलुपता को भलीभांति पहचानते हैं तथा दल-बदलुओं की सही मंशा भांपने में वे कोई गलती नहीं करेंगे. यही कारण है कि भाजपा के सपने के धूलिसात होने में इन दल-बदलुओं की बड़ी भूमिका रही है. इसे पार्टी के अंदर ही बड़ी सिद्दत से महसूस किया जारहा है. 

इसकी एक बानगी देखिये: मतगणना के रुझानों से भाजपा की भारी हार तय हो जाने के बाद भाजपा महिला मोर्चा की राज्य सचिव अर्पिता रायचौधुरी ने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा-बीजेपी नेतृत्व को अब समझ में आ रहा है कि अपने घर का उबला भात दूसरे के घर से चुरायी गयी बिरियानी से काफी अच्छी होती है. यह गला और छाती में दाह पैदा करने वाला तथ्य अगले पांच वर्षों तक काफी कष्ट देने वाला है. पार्टी ने अपने बच्चों को गैर बनाकर जमाई को आसन पर बैठाने का खामियाजा दिया है. यह पोस्ट हार का दर्द नहीं है, जमीनी हकीकत है. बाद में उन्होंने यह पोस्ट डिलिट कर दिया. वस्तुतः तृणमूल के कुछ दल-बदलुओं द्वारा भाजपा का दामन थामने के बाद उन्हें मिल रहे अप्रत्याशित महत्व से पुराने भाजपाइयों, समर्पित कार्यकर्ताओं में विद्वेष, विद्रोह की चिंगारी सुलग रही थी लेकिन मोदी-शाह के सामने किसकी चलने वाली, किसकी हिम्मत जो उनके निर्णय को चुनौती दे. पुराने कार्यकर्ताओं ने यह कड़वा घूंट पी लिया, कर भी क्या सकते थे. यह क्षोभ तो था ही कि हमने वर्षों से भाजपा को संवारा, निखारा और आज हम पर्दे के पीछे हैं, दल-बदलुओं की बहार है. भाजपा की हार में इन दल-बदलुओं की सबसे महती भूमिका है. जनता ने इन्हें स्वीकार नहीं किया, उलटे यह धारणा बलवती हुई कि पार्टी में नेताओं का अभाव है. फिर यह बंगाल है. मतदाता परिपक्व हैं, परिस्थितियों के विश्लेषण में माहिर और षड्यंत्रों को परखने में सिद्धहस्त. फलतः उन्होंने दल-बदलुओं को उनकी औकात दिखा दी. भाजपा भले ही कुछ बड़े चेहरे को तोड़कर कैच आप द डिकेड मानकर इतरायी हो, लेकिन तृणमूल में सेंध लगाकर उसे कमजोर करने का उसका भ्रम जनता ने एक झटके में तोड़ दिया. दलबदल के कुछ प्रमुख चेहरों में राजीव बंद्योपाध्याय 42512, जितेंद्र तिवारी 3803, विश्वजीत कुण्डु 7391, सैकत पांजा 31815 से हारे. ऐसे कई नाम हैं. प्रवीर घोषाल, रथीन चक्रवर्ती, वैशाली डालमिया, सब्यसांची दत्त, शीलभद्र दत्त आदि. सूची काफी लंबी है. एक अन्य दलबदलु शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम में जीत गये और वह भी ममता के खिलाफ. तृणमूल के कुछ नेताओं ने इसमें गड़बड़ी की आशंका जतायी है लेकिन स्वयं ममता ने इसे कोई महत्व नहीं दिया है. अब ये नेता न घर के रहे न घाट के क्योंकि इतना तय है कि उस पराभव के बाद पार्टी में इनका मुखर विरोध होगा और अगर नहीं भी हुआ तो पार्टी नेतृत्व को इनकी क्षमता संदिग्ध लगेगी. कुल मिलाकर इन नेताओं ने अपनी साख के साथ अपना भविष्य भी दांव पर लगा दिया है, जो उज्ज्वल तो कतई नहीं है. वे धोबी के कुत्ते हो गये हैं, न घर के न घाट के.  

ममता के अपमान के खिलाफ महिलाओं ने दिखायी एकजुटता: राजनीति विशेषकर लोकतांत्रिक राजनीति में हार-जीत एक सामान्य प्रक्रिया है, प्रचार अभिन्न अंग, नैतिकता जुड़ा प्रचार लेकिन इस चुनाव में प्रचार के दौरान जो कुछ देखने को मिला, वह घटिया, अनैतिक, अशिष्ट, ओछा और घोर निंदनीय था. विश्वास नहीं होता कि नारियों के सम्मान, शिष्टाचार, नैतिकता का पर्याय माने जाने वाले भारत में हमारे जनप्रतिनिधि ऐसी बातें कर सकते हैं. प्रचार के दौरान न तो विकास की बात हुई, न ही रोजगार की, न शिक्षा की चर्चा हुई न विज्ञान की, न कोरोना पर किसी ने गंभीरता से कोई बात रखी न आर्थिक संकट की. केवब हमले, प्रतिहमले हुए, वह भी अति घटिया स्तर के. चड्ढा, नड्डा, हुंबा, बुंबा, मिथ्यावादी, धंधाबाज, बहिरागत, सिंडिकेट राज, भाइपो, भ्रष्टाचार आदि शब्दों की भरमार रही. शाह ने एक सभा में कहा, तृणमूल केवल भतीजा कल्याण चाहती है, भाजपा जनकल्याण. भतीजा अभिषेक ने चुनौती दी साहस हो तो नाम लो. आसनसोल में तृणमूल से भाजपा में गये शुभेंदु ने कहा, अनुप्रवेशकारियों की फुफु और रोहिंग्यायों की खाला. ममता ने शुभेंदु को मीरजाफर कहा. तृणमूल के परिवर्तन नारे के जवाब में भाजपा का नारा आया, असल परिवर्तन और आमार सोनार बांगला. नंदीग्राम में ममता के पैर में मोच आ गयी और प्लास्टर चढ़ाना पड़ा. शाह ने तो इस पर चुटकी ली ही, राहुल सिन्हा ने कहा कि जितना वो हारती जा रही हैं, बैंडेज का साइज भी उतना ही बढ़ता जा रहा है. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ने तो सारी हदें पार कर दी, कहा, लोग उनका चेहरा नहीं देखना चाहते, इसलिए वे अपना टुटा पैर दिखा रही हैं, यदि आप पैर दिखाना चाहती हैं तो अच्छा हो, बरमूडा पहनें. तृणमूल की ओर से भी गुंडा, धंधाबाज, नड्डा, चड्डा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया. ब्रिगेड की सभा में तृणमूल से भाजपा में गये अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने कहा, मैं कोबरा हूं, एक बार काटने से ही सब समाप्त. तृणमूल ने कहा, बांग्ला निजे मेये के चाय, जवाब में भाजपा का नारा, बांग्ला निजे मेये के चाय, पिसी के नय. केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा, बांग्लार घरेर मेये बाइरेर लोकेर साथे खेलछे. ममता ने चंडीपाठ किया, उसका भी मजाक उड़ाया गया. प्रधानमंत्री मोदी शायद भारी भीड़ और मोदी-मोदी के गगनभेदी नारे से इतने अभिभूत हो जाते हैं कि भूल जाते हैं कि वे देश के प्रधानमंत्री हैं. मोदी ने अपनी हर रैली में कहा, दीदी ओ दीदी. सामान्यतः इसमें कुछ आपत्तिजनक नहीं लगता लेकिन उनके टोन, उनके अंदाज को महिलाओं ने एक महिला की गरिमा के प्रतिकूल माना और इसके विरोध में भाजपा के खिलाफ एकजुट हो गयीं. बड़ी संख्या में महिलाओं के मतदान ने भी भाजपा की नैया डुबोने का काम किया. संख्या के लिहाज से नतीजे अप्रत्याशित रहे क्योंकि 200 के ऊपर के आंकड़े की आशा तो तृणमूल के घोर समर्थक को भी नहीं थी. ममता बनर्जी ने भी दो-तिहाई सीटें जीतने का दावा किया था. फिर क्या ममता की ज़बरदस्त लोकप्रियता के कारण या सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों  के कारण यह करिश्मा हुआ. इस जीत में योगदान भाजपा का कुछ कम नहीं है. दलबदलुओं ने जहां पार्टी में अंतरकलह को जन्म दिया, वहीं ध्रुवीकरण की रणनीति भी बेअसर रही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो आसनसोल में कुछ साल पुराने दंगों का ज़िक्र कर पुराने घावों को कुरेदने की भी कोशिश की.

इस जीत के मायनेः भाजपा के लिए बंगाल का यह चुनाव किसी अश्वमेध यज्ञ से कम नहीं था और ममता ने अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की लगाम थामकर भाजपा के भारत विजय अभियान को रोक दिया है. इससे यह भी स्पष्ट है कि मोदी लहर उतार पर है. पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए. असम तथा पुडुचेरी में भाजपा जीती, केरल वाम मोर्चे के साथ रहा और तमिलनाडु में भाजपा की सहयोगी अन्नाद्रमुक को सत्ता से बेदखल कर द्रमुक सत्ता में आ गयी जिससे कांग्रेस का गठबंधन था. असम और पुडुचेरी की जीत को भाजपा शानदार नहीं कह सकती लेकिन सत्ता में आना छोटी उपलब्धि नहीं होती. केरल में बड़े अरमान पाल रखे थे भाजपा नेताओं ने और मेट्रोमैन को मैदान में उतारकर वहां अपनी उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश की थी लेकिन हाथ लगा शिफर. कर्नाटक, मध्यप्रदेश, गोवा में जिस प्रकार भाजपा ने दलबदल कराकर, विधायकों की खरीदफरोख्त कर सत्ता में आयी थी, उसके मद्देनजर ममता ने लोगों से भारी बहुमत देने की अपील की थी ताकि भाजपा गंदी राजनीति न कर सके और जनता ने जो प्रचंड बहुमत दिया, वह अप्रत्याशित था. इन चुनावों तथा हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनाव ने मोदी के अपराजेय होने का तिलस्म तोड़ दिया है. राजद के तेजस्वी यादव ने मोदी-शाह-नीतीश के साझा जनबल, धनबल को टक्कर दी. तेजस्वी जीत के करीब पहुंच गये थे. मोदी-शाह की सफलता अकसर अभेद्य मानी जाती है किन्तु अब यह मिथक टूट रहा है.

चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने गैर-भाजपाई नेताओं को पत्र लिखकर अपने सारे मतभेद भुलाकर एक मंच पर आने और मोदी-शाह की तानाशाही का सम्मिलित विरोध करने का अनुरोध किया था लेकिन उसे तब किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था. शायद तत्कालीन परिस्थितियों में नेताओं को लगा होगा कि ममता की पराजय आसन्न है और वे डूबते को तिनके का सहारा तलाश रही हैं. अब उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से लिया जायेगा. शायद नेतृत्व के लिए भी उनके नाम पर सहमति बने क्योंकि अखिल भारतीय स्तर पर अपनी साख रखने के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व संकट से जूझ रही है.

दूसरी ओर भाजपा के लिए अग्नि परीक्षा की घड़ी आने वाली है. अगले साल गुजरात, उत्तरप्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड और जम्मू-कश्मीर में चुनाव होने वाले हैँ. भाजपा के कई पुराने सहयोगी साथ छोड़ चुके हैं. ऐसी स्थिति में भाजपा को अपनी साख बचाने की लड़ाई लड़नी होगी.