यूं ही बंगालमय नहीं हो गयी देश की राजनीति


लोकनाथ तिवारी

यूं तो पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं लेकिन चर्चा में तो पश्चिम बंगाल ही है. पारंपरिक मीडिया हो या सोशल मीडिया हर जगह बंगाल की खबरें ही प्रमुखता पा रही हैं. खबरों को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि देश की राजनीति में अन्य चार प्रदेशों का कोई असर नहीं है. इन सवालों के जवाब के लिए भी आपको पश्चिम बंगाल का रुख करना होगा। यहां जिस तरह की सियासी जंग चल रही है, वह लोगों को खूब भा रहा है. यहां की राजनीति में हिंसा, डॉयलॉग, मारधाड़, ड्रामा समेत मनोरंजन के सारे साधन जो मौजूद हैं. यहीं कारण है कि सारे राष्ट्रीय चैनलों ने अपने स्टार एंकरों को बंगाल में उतार दिया है. न्यूज चैनल लोगों का भरपूर मनोरंजन भी कर रहे हैं.

मंच से हीरो डॉयलॉग दे रहे हैं तो चुनावी मैदान में हीरो-हीरोइनें अपना जलवा बिखेर रही हैं. कोकीन कांड में मॉडल फंसी है तो फंसानेवाला भी उसी पार्टी का बाहुबली निकला है. हालांकि बीजेपी इस मामले में पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगा रही है. वहीं दूसरी तरफ ईडी और सीबीआई टीएमसी नेताओं को नोटिस भेजकर पूछताछ कर रही है. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक की पत्नी, साली और रिश्तेदारों को ईडी ने समन जारी कर पूछताछ की है. ममता बनर्जी के पैर में चोट लगने पर हुआ विवाद इसका ताजा उदाहरण है. यह पश्चिम बंगाल का दुर्भाग्य है या सौभाग्य कि यहां आए दिन नित नए विवाद सामने आ रहे हैं.

भाजपा किसी भी कीमत पर इस बंगाल की जंग जीतना चाहती है. जबकि ममता बनर्जी अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं हैं. तृणमूल ने नारा दिया है- ‘खेला होबे’ और खेल शुरू भी है. कांग्रेस और वाममोर्चा भी इस चुनावी समर में एक तरफ टीएमसी तो दूसरी तरफ बीजेपी के खिलाफ समान रूप से मुखर है. पश्चिम बंगाल में इस समय बाहरी का मुद्दा छाया हुआ है. बीजेपी के केंद्रीय मंत्रियों और अन्य राज्यों से आये कद्दावर नेताओं को बाहरी की संज्ञा दी जा रही है. लगभग रोज ही दलबदल कर नेता इधर से उधर छलांल लगा रहे हैं. 

शनिवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया. वह साल 2018 में ही भारतीय जनता पार्टी से अलग हो गए थे. पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सिन्हा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का साथ देने का फैसला किया है. उन्होंने कहा कि देश अजीब परिस्थिति से गुजर रहा है, हमारे मूल्य और सिद्धांत खतरे में हैं. लोकतंत्र की मजबूती संस्थाओं में निहित है और सभी संस्थाओं को व्यवस्थागत तरीके से कमजोर किया जा रहा है. 

बंगाल को कभी वाममोर्चा का गढ़ माना जाता था लेकिन आज यह दक्षिणपंथियों का अखाड़ा बन गया है. वर्ष 2011 में ममता बनर्जी ने बंगाल में 34 वर्षों से सत्ता में रही वाम मोर्चे की सरकार को उखाड़ फेंकने के असंभव से दिखने वाले कारनामे को अंजाम दिया. सूती साड़ी और रबर की हवाई चप्पल में सादगी की प्रतीक ममता की छवि असली वामपंथी नेता के रूप में उभरी. धर्म निरपेक्षता और मूल्यों की राजनीति करनेवाली ममता के 10 वर्षों के शासनकाल में स्वजनपोषण और एक धर्मविशेष के तुष्टीकरण के भी आरोप लगे. यहीं कारण है कि उनकी पार्टी का एक बड़ा तबका उनके ही भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मुखर हो गया है. अब उनको विरोधी खेमे के रूप में बीजेपी का प्लेटफॉर्म मिल गया है.

बंगाल के सामाजिक सौहार्द का धागा अब कमजोर होता दिख रहा है. वर्तमान समय में राज्य का सियासी और चुनावी मिजाज जिस तरह का दिखाई दे रहा है, उसे दबे हुए हिंदू-मुस्लिम तनाव के अचानक फूट पड़ने के तौर पर देखा जा सकता है. यहीं कारण है कि बीजेपी सीधी टक्कर देती नजर आ रही है. 

पीएम नरेंद्र मोदी की ब्रिगेड रैली के बाद बाहरी और भीतरी के आरोपों पर भी बीजेपी के नेता काफी मुखर हैं. बंगाल में काम कर रहे आरएसएस के नेता लोगों को कभी भी यह याद दिलाना नहीं भूलते हैं कि संघ परिवार के देवकुल का प्रमुख नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल से थे. वे जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री थे. नेहरू से मतभेद होने के बाद मुखर्जी ने कांग्रेस से अलग हो गए और 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसका दूसरा जन्म भारतीय जनता पार्टी के तौर पर हुआ. 

2014 के चुनावों में राज्य में पार्टी को 16.8 प्रतिशत मत मिले. कमजोर हो चुके वाम मोर्चे और सिकुड़ चुकी कांग्रेस और दलबदलुओं की सतत आमद से भाजपा ने स्थानीय चुनावों में अपने लिए जगह बनानी शुरू कर दी. भाजपा और आरएसएस के नेता से बात कीजिए तो वे आपको बताएंगे कि इस घड़ी का इंतजार वे वर्षों से कर रहे थे. वे आपको बताएंगे कि कैसे पिछले पांच सालों में आरएसएस की शाखाओं में बढ़ोतरी हुई है और स्कूलों की संख्या कई गुना बढ़ गई है. जहां पहले बुनियाद थी, वहां महल बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है. पांच वर्षों के बाद 2019 में तो बीजेपी ने अप्रत्याशित रूप से 18 सीटें जीत लीं. विधानसभा चुनाव में तो सत्ता पर दावेदारी ठोक रही है. तीसरे मोर्चे के रूप में कांग्रेस-वाममोर्चा और आईएसएफ गठबंधन भी दोनों को चुनौती देने का दावा कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी बंगाल का दंगल ही चर्चा में है. लोगबाग भी चटखारे लेकर बंगाल की चर्चा में चार चांद लगाते नजर आ रहे हैं.