पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव होने वाला है बड़ा खास, बदलता दिखाई दे रहा है सियासी परिदृश्य

बंगाल में सत्ताधारी ममता बनर्जी के लिए संकट की बात यह है कि वे चाहकर भी कोलकाता में विपक्ष द्वारा आयोजित राजनीतिक रैली को नाकाम नहीं बता सकतीं। इसकी वजह है अतीत के उनके राजनीतिक काम। आनुपातिक रूप से देश में सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले राज्य बंगाल पर कब्जे के लिए शुरू में उन्होंने जो मुस्लिम तुष्टिकरण का तरीका अपनाया, उस पर वह 2019 के आम चुनावों तक कायम रहीं। अल्पसंख्यक समुदायों की बहुलता वाले इलाकों में चाहे रैली हो या सामान्य बैठक, ममता दो शब्दों इंशा अल्लाह का धड़ल्ले से इस्तेमाल करती रहीं। इंशा अल्लाह का मतलब होता है, यदि ईश्वर ने चाहा। उन्हें लगता है कि ये शब्द अल्पसंख्यकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और उन्हें अल्पसंख्यकों के नजदीक ले जाने वाले हैं।

ममता बनर्जी 2011 से तीन और शब्दों का इस्तेमाल करती रही हैं। मां, माटी और मानुष। इसी नाम से उनका एक बांग्ला काव्य संग्रह भी है। इसका मतलब था कि मां यानी बांग्ला संस्कृति, मिट्टी यानी बंगाल और मानुष यानी बंगाली समुदाय। इंशा अल्लाह के साथ ही मां, माटी और मानुष के काकटेल ने भद्रलोक को ऐसा प्रभावित किया कि उसने 2016 में तृणमूल की झोली भर दी। कहना न होगा कि भारी जीत के बाद ममता बनर्जी का जोर इन शब्दों पर और बढ़ता ही गया। मालदा में हुए दंगे, मुस्लिम बहुल इलाकों में सरस्वती पूजा आदि पर रोक जैसे कदमों ने राज्य के बहुसंख्यकों को संदेश दिया कि अल्पसंख्यकों की कीमत पर उनके जीवन मूल्यों को तिलांजलि दी जा रही है।

ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी अगर कोशिश नहीं करती तो उसकी राजनीतिक भूल ही कही जाती। उसने कोशिश शुरू की तो भाजपा को ममता ने अपना दुश्मन नंबर एक घोषित कर दिया। इसके लिए उन्होंने सामान्य शिष्टाचार तक को किनारे रख दिया। बंगाल के प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने गई सीबीआइ के खिलाफ धरना देना हो या फिर राज्यपाल को विश्वविद्यालयों में न घुसने देना हो, जैसे कदमों से उन्होंने ऐसा जाहिर किया, जैसे उन्हें भारतीय राज्य और संविधान की परवाह ही नहीं है।

परेड ब्रिगेड मैदान की रैली में उमड़ी भीड़ की वजह उत्तरी कोलकाता में स्थित फुरफुरा शरीफ दरगाह के प्रमुख पीरजादा सिद्दीकी को माना गया है। अजमेर शरीफ के बाद दूसरी प्रतिष्ठित फुरफुरा शरीफ दरगाह के प्रमुख पीरजादा सिद्दीकी पहले ममता बनर्जी के साथ ही थे। लेकिन अब उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ गई। इसके बाद उन्होंने इंडियन सेकुलर फ्रंट यानी आइएसएफ बना ली है। पीरजादा सिद्दीकी पहले ममता के करीबी होते थे। उनके बंगाल में भारी संख्या में अनुयायी हैं। सिंगुर और नंदीग्राम के आंदोलनों में ममता की सफलता के सहयोगी पीरजादा ही होते थे। लेकिन अब वे उनसे नाराज हैं। इसलिए उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली है।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और वाममोर्चा ने मिलकर चुनाव लड़ा था। वह गठबंधन इस बार भी है। बस अंतर यह आया है कि पीरजादा इस गठबंधन में शामिल हो गए हैं, जिसमें उन्होंने 38 सीटें मांगी हैं। इनमें से 30 सीटें अपने हिस्से से वाममोर्चा दे रहा है, जबकि कांग्रेस को अपने हिस्से से आठ सीटें देनी हैं। ब्रिगेड परेड मैदान की रैली में जुटी भीड़ को पैमाना मानें तो यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को मुस्लिम मतदाता एकमुश्त वोट नहीं देने जा रहे हैं। ममता के इस वोट बैंक में एआइएमआइएम भी सेंध लगाने की कोशिश में है।

इसके प्रमुख ओवैसी ने मालदा और मुर्शीदाबाद जैसे जिलों में बाकायदा अपनी यूनिटें बनाई। यह बात और है कि ममता के रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने साम-दाम-दंड-भेद नीति का इस्तेमाल करके सारी यूनिटों को खत्म कराकर ममता की पार्टी में शामिल करा दिया है। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस आश्वस्त नहीं है कि मुस्लिम वोट पिछली बार की तरह थोक में मिलेगा। वाममोर्चा-कांग्रेस गठबंधन की रैली में उमड़ी भीड़ से साफ है कि पिछले आम चुनाव की तरह यह गठबंधन कमजोर नहीं रहने वाला। निश्चित तौर पर वह बड़ा वोट हासिल करने जा रहा है।

अब सवाल उठता है कि जब यह गठबंधन वोट हासिल करने जा रहा है तो फिर इसका फायदा किसे मिलेगा? मौजूदा हालात की वजह से बंगाल के राजनीतिक मैदान में सत्ताधारी ममता बनर्जी की बजाय लड़ाई भाजपा बनाम अन्य पर सिमट गई है। निश्चित तौर पर इसकी वजह ममता बनर्जी हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक कदमों से भाजपा को दुश्मन नंबर एक घोषित किया। इतना ही नहीं, वे भाजपा का खतरा दिखाते हुए उस कांग्रेस और वाममोर्चा से समर्थन मांगने में नहीं हिचकीं, जिससे वे अलग हुई और जिसके खिलाफ उन्होंने बरसों तक संघर्ष किया है।

जाहिर है कि इस माहौल में वैसे तो स्पष्टतया त्रिकोणीय संघर्ष दिख रहा है। लेकिन इस संघर्ष में सत्ताधारी और विपक्षी गठबंधन ने अपनी स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति के तकाजे से भाजपा को ही निशाने पर रखा है। निचले स्तर से आ रही सूचनाएं भी ममता बनर्जी के लिए शुभ नहीं हैं। वाममोर्चा के स्थानीय कार्यकर्ता पिछले कुछ वर्षो में जारी राजनीतिक और प्रशासन के खेल से प्रताडि़त तृणमूल कांग्रेस को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। जिन जगहों पर उन्हें लगेगा कि उनके वोट या अलग लड़ने से तृणमूल को फायदा हो सकता है, वे अपने राष्ट्रीय नेतृत्व की सोच के उलट भाजपा के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान कर सकते हैं।

भाजपा की भावी जीत के खिलाफ तर्क देने वाले अतीत में मिले वोटों का उदाहरण दे रहे हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि कई बार चुनाव धारणा और लहर पर केंद्रित हो जाते हैं। कौन सोच सकता था कि 2012 में उत्तर प्रदेश में महज 48 सीटें जीतने वाली भाजपा की 2017 में ऐसी लहर चलेगी कि वह 325 सीटें जीत लेगी। अनेक तथ्यों से यह स्पष्ट है कि इस बार ममता को कड़ी चुनौती मिल रही है। हालांकि उन्हें खारिज करना भी बड़ी भूल होगी। जैसे-जैसे प्रचार अपने चरम पर पहुंचेगा, तभी पता चल सकेगा कि भद्रलोक के बीच ममता का ही जादू चल पाएगा या भाजपा निर्णायक सेंध लगा पाएगी।

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