Bengal Politics: क्या इस चुनाव में बंगाल में बदलाव का विकल्प बनने की भाजपा की कोशिश सफल होगी?

इस बार बंगाल के विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों से कई मायनों में अलग हैं। अलग इसलिए, क्योंकि इस चुनाव में सत्ताधारी दल के सामने एक ऐसा दल चुनौती बनकर उभरा है, जिसे 2016 के चुनाव में सिर्फ 10.3 फीसद वोट और केवल तीन सीटों पर जीत मिली थी। इसके ठीक तीन साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को 18 सीटों पर जीत मिली।

बंगाल के लिहाज से यह चुनाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2016 के जनादेश में वाम-कांग्रेस गठबंधन प्रमुख विपक्षी दल के रूप में थे, जो इस बार के चुनाव में भी असरहीन नजर आ रहे हैं। भाजपा की बड़ी कामयाबी यह है कि उसने बहुत कम समय में प्रमुख विपक्षी दलों, वाम-कांग्रेस गठजोड़, को हाशिये पर धकेल कर स्वयं को सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बरक्स प्रभावी विकल्प के तौर पर स्थापित किया है। अब सवाल यह है कि क्या इस चुनाव में बंगाल में बदलाव का विकल्प बनने की भाजपा की कोशिश सफल होगी?

पिछले दो-तीन वर्षो में यहां की राजनीति में हुए बदलावों तथा इस चुनाव में भाजपा के लिए जीत की संभावनाओं का आधार समझने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर करना होगा। चुनावी राजनीति के इतिहास का विश्लेषण करने पर बंगाल में सत्ता परिवर्तन का एक पैटर्न नजर आएगा। इसका मूल यह है कि वहां के मतदाताओं के मन में बदलाव की अकुलाहट होना पर्याप्त नहीं होता। विकल्प का आत्मविश्वास पैदा होना भी जरूरी कारक है।

कांग्रेस से अलग होकर 1998 में तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद ममता बनर्जी की पार्टी ने 1999 का लोकसभा चुनाव लड़ा। उस चुनाव में उनकी पार्टी को आठ सीटें और 26 प्रतिशत वोट मिले थे। एक नई पार्टी के लिए यह परिणाम उत्साहजनक था। इसके बाद ममता बनर्जी की पार्टी पहला विधानसभा चुनाव 2001 में लड़ी, जिसमें उनको 60 सीटें और 30 प्रतिशत वोट मिले। साफ है कि लोकसभा में ममता बनर्जी को मिली शुरुआती सफलता की छाप अगले विधानसभा चुनाव में दिखी।

इसके बाद 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को महज एक सीट मिली और ममता बनर्जी की पार्टी 21 प्रतिशत वोट तक सिमट गई। लोकसभा में हार का सीधा असर यह पड़ा कि 2001 विधानसभा चुनाव में 60 सीटें जीतने वाली दीदी की पार्टी 2006 के विधानसभा चुनाव में महज 30 सीटों पर ठहर गईं। उतार-चढ़ाव के बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी ने 19 सीटें जीत लीं। यह जीत बंगाल के मतदाताओं के मन में लंबे समय से चल रहे बदलाव की अकुलाहट को आत्मविश्वास देने का आधार साबित हुई। परिणामत: 2011 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने चुनावी मैदान को स्वीप करते हुए 184 सीटों के साथ कम्युनिस्ट किले को उखाड़ दिया।

इस घटना के दस साल बाद आज के हालात में यह पैटर्न इसलिए मौजूं है, क्योंकि बंगाल की जनता के मन में चल रही सत्ता परिवर्तन की अकुलाहट 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों में साफ उभर कर आई है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने 19 सीटें जीत अगले विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के आत्मविश्वास का आधार मतदाताओं के मन में तैयार किया था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें और 40.6 प्रतिशत वोट हासिल कर भाजपा ने बदलाव का आत्मविश्वास बंगाल की जनता के मन में जगाया है। बंगाल की सत्ता में परिवर्तन का यह पैटर्न अगर गलत नहीं साबित हुआ तो इस बार वहां भाजपा जीतने में कामयाब होगी। वर्ष 2009 और 2019 के बीच एक समानता, बंगाल की आम जनता के सामने राजनीतिक हिंसा, कटमनी, सिंडिकेट नेटवर्क तथा तुष्टीकरण की समस्या का होना है।

बंगाल में भाजपा के बढ़ते जनाधार के पीछे एक कारण है। परंपरागत तौर पर देखा गया है कि भाजपा के विस्तार की यात्र शहरों से गांवों की तरफ जाती है। बंगाल में भाजपा के प्रभाव और उसकी स्वीकार्यता की दिशा इसके ठीक उलट है। भाजपा को बंगाल के गांवों से अधिक समर्थन मिल रहा है। यह रोचक है किंतु इसके निहितार्थ गहरे होंगे। वह ‘गरीब’ की पार्टी, वंचित, शोषित, दलित और आदिवासी वर्ग की पार्टी के रूप में खुद को बंगाल के ग्रामीण इलाकों में खड़ा करने में कामयाब होती दिख रही है। भाजपा का ममता बनर्जी के खिलाफ मजबूती से खड़े दिखने के पीछे यह एक बड़ा कारण है।

वर्ष 2011 जनगणना के अनुसार बंगाल की 68 प्रतिशत से अधिक आबादी गांवों में रहती है। इसमें बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी मतदाता हैं। इन दोनों समुदायों के बीच भाजपा ने अपनी पकड़ को लगातार मजबूत किया है। एकाध क्षेत्रों को छोड़ दें तो बंगाल का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां एस-एसटी समुदाय निर्णायक स्थिति में न हो। कई क्षेत्रों में दोनों तो कुछ जगहों पर दोनों में से कोई एक समुदाय जरूर अच्छी स्थिति में है। ऐसे में भाजपा के लिए यह एक अच्छे परिणामों का संकेतक है।

दलित और आदिवासी समुदाय के बीच भाजपा के बढ़ते जनाधार और तृणमूल सरकार से मोहभंग अकारण नहीं हैं। केंद्र और राज्य के बीच तमाम टकरावों के बावजूद मोदी सरकार की उज्ज्वला योजना के तहत रसोई गैस का लाभ बंगाल के 92 लाख से ज्यादा महिलाओं को मिला है। इसमें 60 लाख से अधिक रसोई गैस पाने वाली महिला लाभार्थी बंगाल के दार्जिलिंग, कलीमपोंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूच बिहार, बीरभूम, पुरुलिया, झारग्राम और पश्चिमी मेदिनीपुर जैसे एससी-एसटी प्रभाव वाले क्षेत्रों में रहती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत 22 लाख आवास लाभाíथयों को मिल चुके हैं।

वर्ष 2019 के लोकसभा में चुनाव में यह पैटर्न देखा गया है कि भाजपा के वोटबैंक में एक बड़ा तबका ‘लाभार्थी समूह’ का जुड़ा था। बंगाल में भाजपा के ग्रामीण इलाकों में मजबूत दिख रहे जनाधार के पीछे प्रमुख कारणों में ‘लाभार्थी वोटबैंक’ फैक्टर भी एक अहम कारण है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है।

बंगाल की सत्ता में बदलाव की संभावनाओं का दूसरा मजबूत कारण तृणमूल कांग्रेस की ममता सरकार के प्रति बहुसंख्यक समाज की घोर नाराजगी है। साढ़े तीन दशकों के कम्युनिस्ट शासन से बंगाल बड़ी मुश्किलों से निकल पाया था, लेकिन सत्ता परिवर्तन को व्यवस्था परिवर्तन में तब्दील करा पाने के बजाय ममता बनर्जी सरकार ने उसी व्यवस्था को अपनाने का आसान रास्ता अख्तियार कर लिया। ममता सरकार के खिलाफ आम लोगों में असंतोष का यह भी बड़ा कारण है। सत्ता की कुर्सी किसके हाथ लगेगी यह दो मई को ही स्पष्ट होगा, लेकिन एक आम धारणा तो बन चुकी है कि बंगाल में राजनीतिक परिवर्तन हो चुका है।