Union Budget 2021: नए संस्थान के समक्ष चुनौतियां, पुरानी गलतियों से सबक लेकर बढ़ें आगे

नए विकास वित्त संस्था यानी डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (डीएफआइ) को सार्थक बैलेंस शीट तैयार करने में समय भी लगेगा। इस कारण डीएफआइ निर्माण प्रक्रिया में सरकार को सतर्कता बरतने के साथ देश में वित्त पोषण की समस्या को दूर करने के लिए दीर्घकालिक नीतिगत बाधाओं को भी दूर करना होगा। आज डीएफआइ के निर्माण का आकर्षण इस बात में है कि यह अल्पावधि में भी लाभदायक साबित हो सकती है। ऐसे में 20 हजार करोड़ रुपये मूल्य बैलेंस शीट वाला संस्थान बनाना मुश्किल नहीं है। असली चुनौती है इसके आकार को बड़ा करना। जब तक बैलेंस शीट कुछ लाख करोड़ रुपये की न हो, नया डीएफआइ अर्थव्यवस्था पर असर नहीं डाल पाएगा।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1991 के आर्थिक सुधार से अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका में व्यापक वृद्धि हुई। इसके बाद देश में फाइनेंसिंग को इक्विटी और डेट दोनों में क्षमता की आवश्यकता प्रतीत हुई। प्रतिभूति बाजार नियामक सेबी तथा स्टॉक एक्सचेंज, डिपोजिटरी तथा क्लियरिंग कॉरपोरेशन जैसे निकायों की स्थापना ने इक्विटी बाजार को जबरदस्त लाभ पहुंचाया। लेकिन डेट मोर्चे पर इतनी प्रगति नहीं हुई, जिसका असर बुनियादी क्षेत्र की फंडिंग पर पड़ा और डीएफआइ जैसे संस्थानों की क्षमता पर भी। इसलिए डीएफआइ के लिए डेट फंडिंग के संपूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करना होगा।

हमारी अर्थव्यवस्था इस समय मंदी की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे में व्यापक स्तर पर मांग में वृद्धि से ही अर्थव्यवस्था गतिशील होगी। डीएफआइ से बुनियादी ढांचा क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के हाथ में नकदी आएगी, लेकिन इसकी खुद धन जुटाने की क्षमता तय करेगी कि यह किस तरह का निवेश आकर्षित करने में सक्षम है। वास्तव में यह एनआइपी की तरह से परियोजना को धन उपलब्ध करा सका, तो देश में आधारभूत संरचनाओं के विकास के साथ अर्थव्यवस्था भी गतिशील होगी।

अतीत में डीएफआइ का हमारा अनुभव भले ही अच्छा नहीं रहा है, लेकिन अन्य विकासशील देशों में विकास परियोजनाओं को वित्त प्रदान करने में डीएफआइ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह विभिन्न विकास परियोजनाओं को प्रतिस्पर्धी दर पर वित्त प्रदान करने की क्षमता रखता है। उचित दरों पर दीर्घावधि वित्त पोषण के मामले में डीएफआइ की सफलता कई कारकों से तय होगी। इन कारकों में सरकार द्वारा प्रभावी तरह से पूंजी डालने के लिए अतिरिक्त बजट संसाधनों को शामिल करना होगा। इसमें दीर्घावधि निवेशकों से संसाधन जुटाया जा सकता है। इस पर भी बहुत कुछ निर्भर है कि प्रस्तावित डीएफआइ का ढांचा किस तरह से तैयार किया जाता है, जिससे कि खास क्षेत्रों जैसे शहरी बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य आदि जरूरतें पूरी हो सकें।

अभी इस समय बैंक नकदी की समस्या से जूझ रहे हैं, ऐसे में आधारभूत संरचना के लिए दीर्घकालिक धन डीएफआइ से आ सकता है। लेकिन जब तक डीएफआइ की पहुंच फंड के सस्ते अंतरराष्ट्रीय स्नोत तक नहीं होगी, तब तक इसके भविष्य पर सवाल उठते रहेंगे। इस कारण सरकार को नियमों में ढील देकर विदेशी दीर्घावधि पूंजी प्रदाताओं को आकर्षित करना होगा। विकासशील देशों में आधारभूत संरचना के वित्तपोषण के लिए विकास वित्त संस्थान के प्रयोग सफल और लोकप्रिय रहे हैं, मगर जब भारत में इसकी चर्चा होती है तो अतीत के कड़वे अनुभव स्मृति पटल पर उभरने लगते हैं। 

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