Bengal Politics: सूबे के सियासी गलियारे में सियासतदानों के तेजी से बदलते पद चिन्ह


अगर पूर्व में हुई गलतियों से सीख नहीं ली जाए तो इतिहास खुद को अवश्य दोहराता है। पिछले दो दशक में बंगाल में जो हुआ, उस इतिहास की क्या इस समय पुनरावृत्ति हो रही है? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका जवाब भविष्य के गर्भ में अवश्य है, पर उसके बाहर आने में ज्यादा वक्त नहीं है। लेकिन जो घटनाएं हो चुकी हैं और हो रही हैं, वे सब इसके संकेत हैं कि बंगाल में इतिहास खुद को दोहरा रहा है। इसका सबसे बड़ा गवाह सूबे के सियासी गलियारे में सियासतदानों के तेजी से बदलते पद चिन्ह हैं।

वैसे तो चुनावी रण में हर पल रंग बदलता रहता है। पर इन दिनों बंगाल की सियासत काफी तेजी से करवट बदल रही है। हालात 2008 से 2017 के बीच हुई सियासी घटनाओं का काफी हद तक रिपीट टेलीकास्ट जैसे दिख रहे हैं। इसकी धुंधली तस्वीर वैसे तो 2018 के पंचायत चुनाव में ही दिखी थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में थोड़ा-थोड़ा स्पष्ट होने लगा था। तृणमूल से कई नेता, सांसद व विधायक भाजपा में शामिल हुए और परिणाम सबके सामने है। एक बार फिर देखा जा रहा है कि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव के पूर्व शनिवार को नंदीग्राम आंदोलन के पोस्टर ब्वॉय सुवेंदु अधिकारी समेत बड़ी संख्या में तृणमूल के नेता, विधायक, सांसद, पार्षद भाजपा में शामिल हुए हैं।

मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी परेशान हैं और भाजपा पर पार्टी तोड़ने का आरोप लगा रही हैं। उन्होंने पिछले सप्ताह बुधवार को उत्तर बंगाल की एक जनसभा में कहा था कि भाजपा ने हमारे प्रदेश अध्यक्ष और नेता को फोन किया और कहा कि उनके साथ बैठक करना चाहते हैं। दुस्साहस देखिए, भाजपा किस हद तक जा सकती है। यदि अधिक पीछे नहीं सिर्फ दो वर्ष पहले हुए नेताओं के दलबदल पर नजर डालें तो इसी तरह से माकपा, कांग्रेस समेत अन्य दलों के नेता तृणमूल पर पार्टी तोड़ने के आरोप लगा रहे थे। वामपंथी व कांग्रेसी कह रहे हैं कि दलबदल की परंपरा शुरू करने वाली तृणमूल को अब उन्हीं की भाषा में जवाब मिल रहा है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी का कहना है कि ममता बनर्जी ने जिस तरह से कांग्रेस को तोड़कर तृणमूल बनाई और इसके बाद भी पिछले एक दशक में कांग्रेसी गढ़ मुर्शीदाबाद व मालदा जैसे जिले में उनके पार्टी नेताओं, विधायकों व सांसद को लालच और डर दिखाकर तृणमूल में शामिल होने को मजबूर किया, आज उसी तरह उन्हें जवाब मिल रहा है। इतिहास खुद को दोहरा रहा है।

वाममोर्चा विधायक दल के नेता व माकपा विधायक सुजन चक्रवर्ती का कहना है कि वाम शासन के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि विपक्ष तृणमूल के साथ बराबरी की लड़ाई हुई थी। लेकिन हमने तृणमूल में सेंध लगाने की कोशिश नहीं की। परंतु 2011 में सत्ता में आने के बाद यह खेल ममता बनर्जी ने तेजी से खेलना शुरू किया और वाम नेताओं को तोड़ा। अब कांग्रेस छोड़ कर तृणमूल में गए सौमित्र खां हो या फिर वामपंथी रहे सुनील मंडल, इन दोनों समेत कई नेता भाजपा का दामन थाम चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में इस तरह के दलबदल की प्रथा नहीं थी। हालांकि कांग्रेस या वाम दलों में टूट हुई, लेकिन ऐसे पालाबदल नहीं हुआ था। परंतु यह परंपरा ममता के 2011 में सत्ता में आने के बाद आगे बढ़ती रही और अब भाजपा उसे आगे बढ़ा रही है। इस पर तृणमूल नेता सौगत रॉय का कहना है कि इस दलबदल से तृणमूल को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाले ऐसे ही आरोप लगाते हैं।

वहीं, जब हम बंगाल के चुनावी इतिहास पर गौर करते हैं तो 2008 में पंचायत चुनाव हिंसा व आतंक के बीच होने के बावजूद विपक्षी तृणमूल को भारी जीत मिली थी। इसके एक वर्ष बाद जब 2009 में लोकसभा चुनाव हुआ तो वाममोर्चा को मात देते हुए तृणमूल ने 19 सीटें जीती और 2011 में 34 वर्षो के वाम शासन का अंत हो गया। अब पिछला परिदृश्य एक बार फिर उभर रहा है। वर्ष 2018 के पंचायत चुनाव के दौरान भीषण हिंसा के बीच भाजपा ने कई जिलों में जीत का परचम लहराया था। 


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