Manufacturing PMI: विनिर्माण गतिविधियों में एक दशक में सबसे तेज वृद्धि, बिक्री में तेजी से कंपनियों ने बढ़ाया उत्पादन

 

कोरोनावायरस के मामलों में फिर से तेजी के चलते दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बार लॉकडाउन की घोषणा की जा रही है। दूसरी ओर, भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोनावायरस के असर की चपेट से निकलती नजर आ रही है। एक हालिया सर्वे में यह बात सामने आई है। दरअसल, आईएचएस मार्किट द्वारा संकलित निक्की मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (Manufacturing PMI) अक्टूबर में 58.9 पर रहा, जो इस साल सितंबर में 56.8 पर रहा था। इस तरह अक्टूबर, 2020 में भारत की मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई, 2010 के बाद विनिर्माण गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि को दिखाती है। इस प्रकार विनिर्माण गतिविधियों में लगातार तीसरे महीने वृद्धि देखने को मिली। 

PMI का 50 से अधिक का आंकड़ा वृद्धि जबकि उससे नीचे का आंकड़ा संकुचन को दिखाता है।

समाचार एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक मांग और उत्पादन में भारी तेजी से विनिर्माण गतिविधियों में यह उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। हालांकि, इसके बावजूद रोजगार के मोर्चे पर अच्छी खबर नहीं मिल रही है क्योंकि कंपनियों ने छंटनी जारी रखा है। 

अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास में 23.9 फीसद का संकुचन दर्ज करने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह काफी राहत भरी खबर है। भारत सरकार ने वायरस के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए लागू की गई अधिकतर पाबंदियों को अब हटा लिया है, जिसका असर आर्थिक गतिविधियों पर देखने को मिला है। 

आईएचएस मार्किट में एसोसिएट डायरेक्टर (इकोनॉमिक्स) पॉलियाना डि लीमा ने कहा कि नए ऑर्डर और उत्पादन से भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर कोविड-19 की वजह से दर्ज किए गए संकुचन से बाहर निकलता दिख रहा है।

लीमा ने कहा कि कंपनियां इस बात को लेकर काफी आश्वस्त दिखीं कि आने वाले समय में बिक्री में तेजी बनी रहेगी।  

दिसंबर, 2014 के बाद विदेशी बाजारों से मांग में सबसे तेज रफ्तार से वृद्धि देखने को मिली। वहीं, उत्पादन और नए ऑर्डर दोनों में पिछले 12 साल में सबसे तेज गति से वृद्धि देखने को मिली। 

हालांकि, इसके बावजूद कंपनियों ने लगातार सातवें महीने कर्मचारियों की छंटनी जारी रखी। इस तरह की चीज सर्वेक्षण की 2005 में हुई शुरुआत के बाद से और कभी नहीं देखी गई थी। 

पिछले महीने लागत और उत्पादन कीमतों में सबसे तेज दर से वृद्धि देखने को मिली। हालांकि, कीमतों में वृद्धि का ज्यादातर बोझ कंपनियों ने खुद वहन किया।