न घर, न रोजगार और गांव लौटने के लिये मीलों लंबा सफर



नई  दिल्ली :  कुछ के लिये बिहार में उनके ही गांव के दरवाजे बंद हैं, तो पश्चिम बंगाल में कुछ को पेड़ों को अस्थायी घर बनाना पड़ा, वहीं केरल में विरोध व्यक्त करने के लिये सैकड़ों लोग राहत शिविर छोड़ सड़कों पर आ गए। देश के अलग-अलग इलाकों से आई ये खबरें एक जैसे लोगों -प्रवासी मजदूरों- से जुड़ी हैं। पकड़े जाने पर अधिकारियों द्वारा पृथक रहने के लिये भेजे जाने के जोखिम के बावजूद हजारों प्रवासी कामगार अब भी पैदल ही राजमार्ग और रेल की पटरियों के सहारे अपने गांव लौटने की जद्दोजहद में जुटे हैं। 

कोविड-19 महामारी ने भारत में एक नए तरह का संकट पैदा कर दिया है, यह संकट राजधानी समेत देश के विभिन्न इलाकों से प्रवासी कामगारों के सामूहिक पलायन से पैदा हुआ है। कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए किए गए राष्ट्रव्यापी बंद के कारण बेरोजगार और बेघर हुए ये लोग अब अपने गृह नगर और गांव जाने के लिये निकल पड़े हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मध्य प्रदेश स्थित अपने गृह नगर के लिये पैदल ही निकल पड़े एक कामगार की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई जबकि बहुत से लोगों को यह डर सता रहा है कि किसी बीमारी के कारण मौत से बहुत पहले ही भूख उनकी जान ले लेगी।

बड़े पैमाने पर हो रहे इस पलायन से चिंतित केंद्र ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासनों से राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन (बंद) के दौरान प्रवासी कामगारों की आवाजाही को रोकने के लिए प्रभावी तरीके से राज्य और जिलों की सीमा सील करने को कहा है। 

लॉकडाउन का उल्लंघन करने वाले लोगों को 14 दिन के लिए पृथक केंद्र भेजा जाएगा। राज्य सरकारों ने भी प्रवासी कामगारों से जहां हैं, उनसे वहीं रहने का अनुरोध करते हुए भोजन और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिये विशेष उपायों की घोषणा की है। कुछ राज्यों ने इन कामगारों को उनके गृह जनपद पहुंचाने के लिये विशेष बसों का भी इंतजाम किया है। 
केरल के कोट्टायम में अपने मूल स्थानों के लिए परिवहन की तलाश में रविवार को सैकड़ों प्रवासी श्रमिक सड़कों पर उतर आये। घटना की सूचना मिलने के तुरंत बाद केरल सरकार ने प्रवासी कामगारों को शांत करने के लिए पुलिस बल तैनात किया और कोट्टायम जिले के अधिकारियों को भेजा। अफसरों ने आंदोलनरत प्रवासी श्रमिकों के साथ बातचीत की और उन्हें वापस उनके शिविरों में भेजने में कामयाब रहे। उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि लॉकडाउन अवधि के दौरान राज्य में उनके सुविधाजनक प्रवास के लिए सभी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी, लेकिन लोगों के निवास स्थान से बाहर निकलने पर केंद्र सरकार द्वारा लगायी गई रोक के निर्देश का उल्लेख करते हुए उनकी यात्रा सुविधाओं की मांग खारिज कर दी।

वहीं, हरियाणा सरकार ने कहा कि उसने दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर अपने घर जाने के इंतजार में फंसे कामगारों को उनके गृह जनपदों तक पहुंचाने के लिये उत्तर प्रदेश को 800 सेनिटाइज्ड बसें उपलब्ध कराई हैं। दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर शनिवार को हजारों की तादाद में लोग अपने घर जाने के लिये बसों के इंतजार में एकत्र हो गए थे जिससे वहां काफी अफरा-तफरी जैसी स्थिति हो गई थी। कई किलोमीटर पैदल सफर कर दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के प्रवासी कामगार आनंदविहार, गाजीपुर और गाजियाबाद के लाल कुआं इलाके में पहुंचे थे। 

गौरतलब है कि दिल्ली, हरियाणा और पंजाब में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के बहुत से कामगार काम करते हैं। बंद के बीच दिल्ली से 400 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के कन्नौज में अपने पैतृक गांव पैदल ही जा रही सावित्री ने कहा, “अगर हम यहां रहे तो किसी बीमारी से पहले भूख से मर जाएंगे। यहां हमारे अंतिम क्रिया-कर्म का भी ध्यान देने वाला कोई नहीं है।” 30 वर्षीय सावित्री राजौरी गार्डन की मलिन बस्ती में रहती थीं। वह बताती है, लॉकडाउन की वजह से नौकरी छूट गई और दो छोटे बच्चों को खिलाना मुश्किल हो गया, इसलिए उन्हें पैदल ही अपने गांव जाने का कठिन फैसला लेना पड़ा। सिर पर सामान की गठरी लेकर मथुरा राजमार्ग पर चल रही सावित्री ने बताया, ‘‘लोग कह रहे हैं कि किसी वायरस से हमारी मौत हो जाएगी। मैं यह सब नहीं समझती। मैं मां हूं और मुझे दुख होता है जब बच्चों को खाना नहीं खिला पाती। यहां कोई मदद करने वाला नहीं है। सभी को अपनी जान की चिंता है।’’ कुछ कारपोरेट घराने और दूसरे सामाजिक संगठन भी ऐसे वक्त में लोगों की मदद के लिये आगे आ रहे हैं। लोगों की मदद में लगे डीएलएफ फाउंडेशन ने बताया कि वह जिला प्रशासन के सहयोग से वह गुरुग्राम और मानेसर में 60,000 से अधिक प्रवासी श्रमिकों को भोजन उपलब्ध करा रही है। दिल्ली और नोएडा में भी उसने करीब 25 हजार लोगों को भोजन उपलब्ध कराया है। दिल्ली सिख गुरद्वारा प्रबंधक समिति ने कहा कि वह राष्ट्रीय राजधानी में बंद के दौरान रोजाना करीब 50 हजार लोगों को मुफ्त भोजन उपलब्ध करा रही है। उसने प्रवासी कामगारों और दिहाड़ी मजदूरों को भोजन कराने में मदद के लिये सभी से राशन का सामान और नकदी दान की अपील की है। 

वहीं सैकड़ों किलोमीटर चलकर बिहार और उत्तर प्रदेश के अपने पैतृक गांव पहुंचे कई प्रवासी कामगारों ने पाया कि कोई वहां उनका स्वागत नहीं कर रहा और उनके बारे में पुलिस को जानकारी दी गई है जो इसके बदले जांच और आगे की प्रक्रिया के लिये उन्हें चिकित्सा कर्मियों को सौंप रहे हैं। 

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के बलरामपुर गांव में चेन्नई से लौटे श्रमिकों के एक समूह को खुद पृथक रहने की अवधि के दौरान पेड़ों को अपना अस्थायी घर बनाना पड़ा। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें वायरल होने के बाद हालांकि स्थानीय प्रशासन ने दखल दिया और उन्हें एक पृथक केंद्र में रखा गया। 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने रविवार को आश्वस्त किया कि उनकी सरकार सभी प्रवासी मजदूरों की देखभाल करेगी और मूलभूत जरूरतें जैसे खाना पानी उपलब्ध कराएगी। वेबकास्ट के जरिये उन्होंने बताया कि ‘‘ शिव भोजन’’ योजना के तहत एक अप्रैल से 10 रुपये के बजाय पांच रुपये में खाना मिलेगा। ठाकरे ने बताया कि पूरे राज्य में पहले ही 163 केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं जहां पर प्रवासी मजदूरों को खाना और पानी मुहैया कराया जा रहा है। 

वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बी एल संतोष को बंद के दौरान राष्ट्रीय राजधानी से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों के पलायन में साजिश नजर आती है। पार्टी के संगठन महासचिव संतोष ने सिलसिलेवार ट्वीट में कहा कि बेंगलुरु में ऐसा कोई पलायन नहीं है जो तमिलनाडु सीमा और तमिलनाडु से लगती आंध्र प्रदेश सीमा से महज 36 किलोमीटर दूर है। संतोष ने ट्वीट किया, ‘‘तमिलनाडु सीमा बेंगलुरु से महज 36 किलोमीटर दूर है...आंध्र चेन्नई से 100 किलोमीटर से कम दूर है। प्रवासी मजदूरों का कोई पलायन नहीं। सिर्फ दिल्ली से ही क्यों...? यहां कुछ गड़बड़ है। क्या कोई साजिश कर रहा है...? लॉकडाउन का उद्देश्य विफल हो रहा है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लिखे पत्र में बंद की वजह से गरीबों की दुर्दशा को उजागर किया और घातक बीमारी से लड़ने के लिए कुछ विकसित देशों द्वारा घोषित पूर्ण बंद के अलावा अन्य कदम उठाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘‘यह समझना हमारे लिए महत्वपूर्ण है कि भारत की स्थितियां अलग हैं। हमें बड़े देशों की तुलना में अलग कदम उठाने होंगे जो पूरी तरह बंद की रणनीति अपना रहे हैं।’’ उन्होंने आशंका जताई, ‘‘पूरी तरह आर्थिक बंद से कोविड-19 के कारण मरने वालों की संख्या खतरनाक रूप से बढ़ जाएगी। अचानक बंद होने से काफी भय और भ्रम पैदा हो गया है।’’ उन्होंने कहा कि फैक्टरियां, छोटे उद्योग और निर्माण स्थल बंद हो गए हैं और हजारों लोग कठिन यात्रा कर अपने गृह राज्यों में पहुंच रहे हैं।” पंजाब में सरकार ने औद्योगिक और वाणिज्यिक संस्थाओं से बंद के दौरान कामगारों की तनख्वाह न काटने को कहा है। ऐसी ही अपील दिल्ली की आप सरकार और उत्तर प्रदेश में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार की तरफ से भी की गई है।