घृणा तथा द्वेष का सदुपयोग

धर्मग्रंथों में मनुष्य जाति के एक सबसे बड़े दुश्मन का उल्लेख है। इसलाम और ईसाई धर्म में उसे 'शैतान' कहा गया है। हिंदू धर्म में उसका नाम 'असुर' है। यह शैतान ईश्वर का विरोधी और मनुष्य जाति को बहकावे में  डालकर नरक की ओर ले जाने वाला है। इस शैतान या असुर से घृणा एवं द्वेष करने के लिए विविध प्रकार से शास्त्रों में आदेश दिए गए हैं। यह शैतान कोई भूत-पलीत या अदृश्य जीव नहीं, वरन हर समय, हर घड़ी साथ रहने वाला एक तत्त्व है, इसे कठोर भाषा में 'पाप' और हलकी भाषा में 'अज्ञान' कहा जाता है। योगशास्त्र कहता है कि हरेक साधक पाप से घोर घृणा करे, उसे अछूत समझे, अपने को उसका स्पर्श होने से भली प्रकार बचाए। जहाँ भी पाप की लीला दिखाई पड़े, वहीं घृणा की लपलपाती हुई नंगी तलवार उसकी गरदन पर बरस पड़े। एक क्षण के लिए भी इस दुश्मन से संधि नहीं होनी चाहिए। अज्ञान के पंजे से छूटकर ज्ञान प्राप्त करने का जब भी, जहाँभी, जितना भी अवसर आए, उसे अविलंब ग्रहण किया जाए। योगशास्त्र कहता है कि हे बहादुर अभ्यासियो ! उठो !! अपने अंदर से और दूसरों के अंदर से पाप तथा अज्ञानरूपी शत्रुओं को मार भगाने के लिए घोर संहार करो,अपना सर्वस्य कस बाजी लगा दो।




मन में कोई अनावश्यक विचार मत आने दीजिए। रोकने  का अभ्यास कीजिए। बेकार और अवांछनीय विचारों का मस्तिष्क में प्रवेश मत होने दीजिए, वे बाहर ही रुक जाने चाहिए, मन को नियत दिशा में ही दिलचस्पी होनी चाहिए, इधर-उधर के प्रलोभनों और चित्त को उचटाने वाले संस्मरणों को अपने पास मत फटकने दीजिए। पुराने जमा किए हुए स्वभाव और विश्वासों को मार भगाइए और फिर उनके लिए सदा को किवाड़ें बंद कर दीजिए। न तो त्याज्य विचार मन में आने चाहिए और न निषिद्धि कर्म शरीर से होने चाहिए। यह तभी हो सकता है, जब त्याज्य वस्तुओं के प्रति शत्रु दृष्टि रहे। यह शत्रु दृष्टि वास्तव में मित्रों को बढ़ाने वाली है। घृणा और द्वेष का यही सदुपयोग है, इसीलिए परमात्मा ने यही वृत्तियाँ मनुष्य को दी हैं। हर मनुष्य को  घृणा और द्वेष को सतेज करना चाहिए और इन प्रबल हथियारों के द्वारा के सारे अवांछनीय झाड़-झंखाड़ों को काटकर साफ कर देना चाहिए।