Dhanteras: धनतेरस पर क्यों की जाती है भगवान धनवंतरि की पूजा


कार्तिक मास की शरद पूर्णिमा के बाद मौसम में आए बदलाव का असर हमारे शरीर पर पड़ता है। गर्मी से ठंड के एहसास के इस मौसम में मनाई जाने वाली धनवंतरि जयंती भी स्वास्थ्य के प्रति सजगता का एहसास कराती हैं। इसके बगैर बुद्धि, विद्या,वैभव, बल, संपदा सब बेकार है। एक ओर उत्तम हष्ट-पुष्ट बलिष्ठ शरीर, वैयक्तिक संपत्ति कही जाती है, वहीं वैभव,धन, सम्पदा, साधन संपत्ति के रूप में जाने जाते हैं।
 
मान्यता है कि धनवंतरि त्रयोदशी (धनतेरस) को ही समुद्र मंथन से धन-धान्य एवं रत्नादि संपदा के स्वामी कुबेर का आविर्भाव हुआ। अत: दीपदान, मिठाइयां, नूतन वस्त्र, धातु-पात्र, नए बही खाते एवं कलम-दवात की पूजा भी व्यापारी वर्ग करता है। रात्रि देर तक बाजारों में क्रय-विक्रय का मेला चलता है। वास्तव में धनतेरस शारीरिक तथा सामाजिक स्वास्थ्य समृद्धि का पर्व है। 

ऐसा काल चक्र चला कि हम शारीरिक स्वास्थ्य को भूल गए तथा सामाजिक स्वास्थ्य की प्रधानता के साथ धनतेरस को केवल सम्पदा विनिमय का पर्व मानने लगे। यह सब मुद्रा के मूल्यांकन की महत्ता के समाज में व्याप्त होने से जुड़ा हुआ है। वस्तुत: धनतेरस सभी के लिए स्वास्थ्य एवं सुख-समृद्धि का पर्व है। 

आयुष मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से वर्ष 2016 से प्रत्येक वर्ष धनतेरस को 'राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने की लिए घोषणा की। भारतीय पौराणिक विश्वास के अनुसार मानव जीवन को सुगम बनाने के लिए बुद्धिजीवियों मिलकर सामाजिक विचार मंथन किया। दोनों ने एकमत से यह तय पाया कि जीवन चलाने के लिए नियंत्रण विधान एवं साधन संपन्नता अपेक्षित है। साधन प्राप्ति हेतु पृथ्वी के चारों ओर व्याप्त जलराशि क्षीर सागर को लक्ष्य बनाकर समुद्र मंथन कर उससे प्राप्त प्रतीकों का प्रयोग जीवन निर्वाह हेतु आरम्भ किया। 

समुद्र मंथन वास्तव में मानव जीवन में किये जाने वाले कर्म का प्रतीक है। समुद्र मंथन से हमे जो प्रेरणा मिलती है उसमें वैयक्तिक और सामाजिक दोनों प्रकार की संपदाओं का समावेश होता है।