Navratri 2021 : झूले पर सवार होकर आ रही मां दुर्गा की हाथी पर होगी विदाई, जानिए नवरात्र के संपूर्ण विधान

शक्ति आराधना का पर्व शारदीय नवरात्र सात अक्‍टूबर से शुरू हो रहा है। नवरात्र के मौके पर आस्‍था का कोई ओर छोर नहीं होता। आइए जानते हैं नवरात्र के सभी विधान और परंपराओं संग मान्‍यता भी- 

सर्वरूपमयी देवी सर्वं देवीमयं जगत।

अतोहं विश्वरूपां तां नमामि परमेश्वरीम्।।

अर्थात यह समग्र विश्व शक्ति के द्वारा सृजित होकर शक्ति से ही पालित होता हुआ प्रलयावस्था में शक्ति में ही समाहित हो जाता है। शक्ति के बिना किसी देवत्त्व का देवत्व भी प्रभावी नही होता। स्वयं भगवान विष्णु की महिमा एवं शिव का शिवत्व भी इसीलिए है क्यों कि शक्ति स्वरूपा मां लक्ष्मी एवं माता पार्वती ने उनका वरण कर रखा है। इसीलिए तो भगवती की स्तुति में स्वयं आदि शंकराचार्य जी ने कहा है कि हे भवानी! चिता भस्म से विभूषित, गले मे सर्प की माला धारण किये, जटाधारी, श्मशानवासी, कपाली, भूत-प्रेतों के स्वामी एवं दिगम्बर स्वरूप होते हए भी भगवान शिव को त्रिलोक ईश्वर के रूप में इसीलिए पूजता है क्योंकि आपने (पार्वती ने) उनका हाथ पकडकर रखा है। और यह शाश्वत स्वरूप में विराजमान शक्ति इस जगत में आदिशक्ति जगन्माता के रूप में विख्यात है।

बीएचयू ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय पांडेय इस लौकिक जगत में भी सभी प्राणियों के लिये मातृभाव की महती महिमा शास्त्र एवं लोक दोनों में ही प्रतिष्ठित है। मानव जीवन मे माता अग्र पूज्या होती है क्योंकि मनुष्य सर्वप्रथम माता की गोद से ही लोक- दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करता है, इसलिये माता ही सभी प्राणियों की आदिगुरु के रूप में भी प्रतिष्ठित है। समस्त जगत के प्रति उसकी करुणा, वात्सल्यभाव और कृपा मानवजाति के लौकिक तथा पारलौकिक कल्याण का आधार है; इसीलिये 'मातृदेवो भव पितृदेवो भव आचार्यदेवो भव'-इन श्रुतिवाक्यों में सबसे पहले माता का ही स्थान है। जो भगवती महाशक्तिस्वरूपिणी देवी तथा समष्टिस्वरूपिणी सम्पूर्ण जगत् की माता हैं, वे ही सम्पूर्ण लोकों को कल्याण का मार्ग प्रदर्शित करने वाली ज्ञानगुरुस्वरूपा भी हैं।

वास्तव में महाशक्ति ही परब्रह्म के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जो विभिन्न रूपों में अनेकविध लीलाएं करती रहती हैं। उन्हीं की शक्ति से ब्रह्मा विश्व का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिव संहार करते हैं, अत: ये ही जगत् का सृजन-पालन-संहार करने वाली आदिनारायणी शक्ति हैं। ये ही महाशक्ति नौ दुर्गाओं तथा दस महाविद्याओं के रूप में प्रतिष्ठित हैं और ये ही महाशक्ति देवी अन्नपूर्णा, जगद्धात्री कात्यायनी, ललिता तथा अम्बा हैं। गायत्री, भुवनेश्वरी, काली, तारा, बगला, षोडशी, त्रिपुरा, धूमावती, मातंगी, कमला, पद्मावती, दुर्गा आदि देवियां इन्हीं भगवती के ही रूप हैं। ये ही शक्तिमती हैं और शक्ति हैं नर हैं और नारी भी हैं। ये ही माता-धाता-पितामह आदि रूप से अधिष्ठित हैं। अभिप्राय यह है कि परमात्मस्वरूपिणी महाशक्ति ही विविध शक्तियों के रूप में सर्वत्र क्रीडा करती हैं- 'शक्तिक्रीडा जगत् सर्वम्' सम्पूर्ण जगत् शक्ति की क्रीडा (लीला) है। शक्ति से रहित हो जाना ही शून्यता है।

शक्तिहीन मनुष्य का कहीं भी आदर नहीं किया जाता है। ध्रुव तथा प्रहलाद भी भक्ति की शक्ति के कारण ही पूजित हैं । गोपिकाएँ प्रेमशक्ति के कारण ही जगत् में पूजनीय हुईं। हनुमान् तथा भीष्म की ब्रह्मचर्यशक्ति; वाल्मीकि तथा व्यास की कवित्वशक्ति; भीम तथा अर्जुन की पराक्रमशक्ति; हरिश्चन्द्र तथा युधिष्ठिर की सत्यशक्ति और शिवाजी तथा राणाप्रताप की वीरशक्ति ही इन महात्माओं के प्रति श्रद्धा-समादर अर्पित करने के लिये सभी लोगों को प्रेरणा प्रदान करती है। सभी जगह शक्ति की ही प्रधानता है। इसलिये प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि 'सम्पूर्ण विश्व महाशक्ति का ही विलास है।' श्रीमद्देवीभागवत में भगवती स्वयं उदघोष करती है 'सर्व खल्विदमेवाह नान्यदरित सनातनम्।' अर्थात् समस्त जगत् मैं ही हूँ, मेरे अतिरिक्त अन्य कुछ भी सनातन तत्त्व एवं परम सत्य नहीं है। इस प्रकार की शक्ति सम्पन्ना देवी की आराधना भक्त गण अहर्निश करते रहते हैं परन्तु कालः शुभक्रिया योग्यो मुहूर्तोभिधीयते के अनुसार देवी आराधना हेतु कुछ काल विशेष भी वर्णित है जिसमें सामान्य की अपेक्षा अनंत गुणित फल की प्राप्ति होती है। इस देवी आराधना के शुभ काल को शास्त्रों में नवरात्र शब्द से प्रतिपादित किया गया है।

सामान्यतः नवरात्र चार होते हैं। जिनमें प्रथम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त, दूसरा आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त, तीसरा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त तथा चतुर्थ माघ शुक्ल प्रतिपदासे नवमी पर्यन्त सारस्वत-नवरात्र।

इन चारों में भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले वासन्तिक नवरात्र जो कि शयनाख्य नाम से भी वर्णित है तथा अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आरम्भ होने वाले शारदीय नवरात्र जिसे शास्त्रों में बोधनाख्य' नवरात्र भी कहा जाता है अत्यधिक लोक प्रसिद्ध हैं इनमे सर्वत्र देवी की आराधना होती हैं। शेष दो नवरात्रों के समय शक्ति-पीठों में यत्र-तत्र देवी आराधना का विशेष प्रचलन है।

रुद्रयामलतन्त्र में कहा गया है कि- 'नवशक्तिसमायुक्तां नवरात्रं तदुच्यते' नौ शक्तियों से युक्त होने से इसे नवरात्र कहा गया है।

लोक प्रसिद्ध इन दो नवरात्रों में भी शयनाख्य चैत्रमासीय नवरात्र की अपेक्षा बोधनाख्य शारदीय नवरात्र का प्राशस्त्य शास्त्रों में व्यापक है। जैसा कि 'बृहत्सारसिद्धान्त' में कहा गया है-

आश्विनस्य सिते पक्षे नानाविधमहोत्सवैः।

प्रसादयेयुः श्रीदुर्गा चतुर्वर्गफलार्थिनः॥

अर्थात् आश्विन शुक्लपक्ष में विशेष महोत्सवों से श्रीदुर्गा जी की आराधना मानव जीवन के परम पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इन चारों को प्रदान करने वाली होती है।

एक प्रसंग में देवी पार्वती शङ्कर जी से कहती हैं कि शरत्कालीन नवरात्र- में जो मनुष्य मेरी आराधना भक्तिपूर्वक करते हैं, उनसे मैं प्रसन्न होकर सुख, शान्ति, समृद्धि, सौभाग्य, धन संपत्ति, आरोग्यता तथा सर्वविध उन्नति प्रदान करती हूँ। अतः सारांश रूप में यह कह सकते हैं कि शारदीय नवरात्र में देवी की पूजा सीमातीत फलदायिका होती है। इस समय निष्कामोपासक भक्तों को तो देवी स्वयं को भी प्राप्त करा देती हैं।

दुर्गा शब्द का अर्थ

दैत्यनाशार्थवचनो दकार: परिकीर्तितः।

उकारो विघ्ननाशस्य वाचको वेदसम्मतः॥

रेफो रोगघ्नवचनो गश्च पापघ्रवाचकः।

भयशत्रुघ्रवचनश्चाकारः परिकीर्तितः॥

देवीपुराण के उपर्युक्त वचनों के अनुसार दुर्गा शब्दमें 'द' कार दैत्यनाशक, 'उ' कार विघ्ननाशक, 'रेफ' रोगनाशक, 'ग' कार पापनाशक तथा 'आ' कार भयशत्रुनाशक है। जिससे दुर्गा 'दुर्गतिनाशिनी' के रूप में भी विख्यात हैं।

वर्ष 2021 का शारदीय नवरात्र

इस वर्ष झूला झूलते हुए आ रहीं हैं मां दुर्गा

इस बार मां दुर्गा 7 अक्टूबर 2021 गुरुवार के दिन झूले पर सवार होकर आ रही है। झूले पर आगमन का फल मृत्युतुल्य कष्ट कहा गया है।

देवी आराधना के 9 दिनों के इस काल विशेष नवरात्र में आश्विनशुक्ल प्रतिपदा में कलशस्थापन का विधान होता है। परन्तु इस दिन चित्रा तथा वैधृति में कलशस्थापन का निषेध है क्योंकि चित्रा में देवी स्थापना से धन नाश तथा वैधृति में कलश स्थपना से पुत्रनाश होता है। इसीलिए कहा गया है कि-

त्वाष्ट्र वैधृति युक्ताचेत्प्रतिपच्चण्डिकार्चने।

तयोरन्ते विधातव्यं कलशारोपणं गृहे।।

इस वर्ष आश्विनशुक्ल प्रतिपदा गुरुवार को सम्पूर्ण दिन चित्रा तथा

वैधृति है। सम्पूर्ण दिन चित्रा तथा वैधृति होने पर मध्याह्न में अभिजिन्मुहूर्त में कलशस्थापन करना चाहिए। जैसा कि शास्त्र में उल्लेख भी है-

“सम्पूर्ण प्रतिपदि चित्रा वैधृति सत्त्वे मध्यदिनेऽभिजिन्मुहूर्ते कलशस्थापनमुक्तम्।"

अत: धर्मसिन्धु के इस वचनानुसार इस वर्ष आश्विनशुक्ल प्रतिपदा गुरुवार (7 अक्टूबर 2021) को अभिजिन्मुहूर्त (दि. 11.37 से दि. 12.23 तक) में कलश स्थापन करना उत्तम रहेगा।

इस वर्ष षष्ठी तिथि का क्षय होने से आठ ही दिन की नवरात्र होगा।

महाष्टमी का व्रत- 13 अक्टूबर को किया जाएगा। दुर्गा जी का प्रस्थान शुक्रवार 15 अक्टूबर दशमी तिथि को हाथी वाहन से होगा और यह अच्छी वृष्टि का सूचक होता है।


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