Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में एक बार फिर शुरू हुई दल-बदल की सियासत

अभी चुनाव का कोई मौसम नहीं है, फिर भी बंगाल में दलबदल की सियासत तेज है। विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हुए मौकापरस्त दलबदलुओं का स्वार्थ सिद्ध नहीं हुआ तो फिर से वे अपने पुराने दल में लौटने लगे हैं। वैसे तो इसकी शुरुआत चुनाव परिणाम आने के महज एक माह बाद ही मुकुल राय से हुई थी। उन्होंने अपने पुत्र शुभ्रांशु के साथ तृणमूल में घर वापसी की थी। इसके बाद से कहा जाने लगा था कि मुकुल के खेमे में भाजपा के 30-35 विधायक हैं जो किसी भी समय तृणमूल में शामिल हो सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। परंतु सोमवार और मंगलवार को भाजपा के टिकट पर जीते दो विधायकों ने तृणमूल में वापसी कर ली। दोनों तृणमूल छोड़कर ही भगवा झंडा थामे थे। यह सब बंगाल में पहली बार नहीं हो रहा है। पिछले दस वर्षो के तृणमूल शासन में दलबदल की राजनीति खूब हुई है।

तृणमूल ने कांग्रेस व वामपंथियों की इसी दलबदल की राजनीति के सहारे ही कमर तोड़ दी। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक साल पहले तक तृणमूल में वरिष्ठ मंत्री व नेता रहे सुवेंदु अधिकारी जो अभी भाजपा विधायक व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं उनका कहना है कि पिछले दस वर्षो में लालच-पुलिस अन्य तरह से डरा-धमका कर तृणमूल ने करीब 50 विधायकों का दलबदल कराया है। खैर, दलबदल की सियासत हर राज्य में होती है, इसे लेकर अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। परंतु एक बात सबसे बड़ी यह कि यह दलबदलु नेता अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए आम जनता के विश्वास और भरोसे को बार-बार तोड़ रहे हैं। यह नहीं होना चाहिए।

यदि किसी विधायक को दलबदल करना ही है तो पहले जिस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीते हैं उसे उससे इस्तीफा देना चाहिए। पर ऐसा नहीं है। नैतिकता की उम्मीद इन दलबदलुओं व मौका परस्त नेताओं से नहीं की जा सकती। मंगलवार को भाजपा के उत्तर 24 परगना जिले के बागदा विधानसभा सीट से विधायक विश्वजीत दास फिर से तृणमूल में शामिल हो गए। इससे पहले वह तृणमूल के विधायक रहते हुए भाजपा में शामिल हुए थे। इससे एक दिन पहले बांकुड़ा के बिष्णुपुर के भाजपा विधायक तन्मय घोष ने वापसी की थी। वे भी पहले तृणमूल में ही थे और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजप में शामिल हो गए थे, टिकट भी मिल गया और विधायक भी निर्वाचित हो गए। घोष की तृणमूल में वापसी पर भाजपा का कहना है कि पुलिस के भय से वे शामिल हुए हैं। क्या इन विधायकों के खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई होगी? यह बड़ा सवाल है।