Bihar Politics: बिहार की राजनीति में तबादले के मौसम में मंत्री जी का हाल बेहाल

बिहार में जून का खासा महत्व है। मानसून ही नहीं यह तबादलों का भी मौसम होता है। इस मौसम का सभी को इंतजार रहता है। लेकिन इस बार यह मौसम समाज कल्याण मंत्री मदन सहनी को नहीं सुहाया। रिएक्शन ऐसा हुआ कि वे इस्तीफा-इस्तीफा भजने लगे हैं। हालांकि अभी इस पर अमल तो नहीं किया है, लेकिन भजना भी नहीं रुका है। मंत्री जी का दर्द भी कम नहीं है। उनकी पैरवी को उनके ही अधिकारियों ने तवज्जो नहीं दी तो बेचारे क्या करते? क्षेत्र में मुंह भी दिखाना है और आगे की राजनीति का जुगाड़ भी करना है। अगर इतना भी न करवा पाए तो मंत्री किस बात के?

मदन सहनी जदयू के टिकट पर दरभंगा के बहादुरपुर विधानसभा क्षेत्र से चुने गए हैं। वे तीसरी बार विधायक बने हैं और दूसरी बार मंत्री। उनकी कसक इस बात की है कि अधिकारी उनकी सुनते नहीं। इधर तबादलों का मौसम जब आया तो उनकी सूची भी तैयार हो गई। 134 सीडीपीओ के स्थानातंरण की सूची उन्होंने भेज दी। लेकिन उनके अपर मुख्य सचिव अतुल प्रसाद ने उसे तवज्जो नहीं दी। 30 जून आखिरी तारीख थी। समय गुजरता देख बेचारे हर दर पर संपर्क करने लगे, लेकिन किसी ने भाव नहीं दिया। कसक गुबार में बदली और वे फट पड़े कि अधिकारी छोड़ो, चपरासी तक उनकी बात नहीं सुनते। अब मंत्री जी इस्तीफा देने पर उतारू हैं। मजा लेने वाले इस पूरे घटनाक्रम पर निगाह लगाए हैं। कोई कह रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार संभाल लेंगे और इस्तीफा नहीं होगा तो कोई कह रहा है कि मामला तूल पकड़ेगा और सिर्फ उनका इस्तीफा ही नहीं तैयार है, बल्कि उनकी जाति से आने वाले तमाम लोग संगठन से भी इस्तीफा दे देंगे। मंत्री जी शुक्रवार को अपने साथी विधायक के अंतिम संस्कार के लिए कुशेश्वर स्थान गए हैं। शनिवार को उनके पटना आने पर आगे का दृश्य सामने आएगा। सिस्टम में उनका प्रलाप नक्कारे की तूती ही अभी तक साबित हुआ है। उनके दर्द पर अभी तक कोई भी जिम्मेदार नहीं बोला है।

जून का इंतजार सभी मंत्रियों और बड़े अधिकारियों को रहता है। इसमें थोक में तबादले होते हैं। जिसमें लंबे रेट होते हैं। मनचाही पोस्टिंग हो या तबादला रुकवाना हो, सभी के लिए रकम तय होती है। अब तक लगभग 2300 तबादले हो चुके हैं। जिसकी चल गई उसकी चांदी और जिसकी नहीं चली उसको आया माल लौटाने की दिक्कत। इस बार कुछ की खूब चली, जबकि जो हल्के पड़े, वे निपट गए। अमूमन काम न करवा पाने वाले दिल मसोस कर रह जाते हैं, लेकिन इस बार मंत्री मदन सहनी ऐसे उदाहरण हैं जो पूरी व्यवस्था पर फट पड़े। उनकी बात का समर्थन करने के लिए बाढ़ से भाजपा विधायक ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू और बिस्फी विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल भी उतर पड़े हैं। दोनों ने ही तबादलों में मोटी रकम उगाहने के खेल पर मोहर लगाई है। ज्ञानू तो यहां तक कह बैठे कि अगर मंत्रियों के यहां इस समय छापे पड़ें तो करोड़ों मिलेंगे। सरकार के सहयोगी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के जीतनराम मांझी ने भी मदन सहनी के आरोपों को सही ठहराया है। हालांकि लेन-देन के इस कारोबार में कुछ विभाग ऐसे भी रहे जिनमें पैसा-पैरवी नहीं चली। घपला देख शिक्षा विभाग में पटना के बेसिक शिक्षा अधिकारियों के तबादले की सूची निरस्त कर दी गई।

इधर भाजपा कोटे के उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन के साथ भी खेल हो गया। उद्योग विहीन बिहार में जब महत्वहीन उद्योग विभाग उन्हें मिला तो वे उसे खड़ा करने की ठान बैठे। देशभर में अपने संबंधों के आधार पर तमाम उद्योगपतियों से संपर्क कर बिहार में लाने की कवायद करने लगे। इथेनाल उत्पादन का उनका पासा सही पड़ा और तमाम लोगों ने रुचि दिखाई। जब कवायद पूरी हो गई तो उन्हें लगा कि इसकी घोषणा की जाए। मंत्री जी ने शुक्रवार का दिन तय किया। लेकिन जब वो गुरुवार को मुंबई से पटना चलने को तैयार हुए, उसी समय बिहार में राज्य निवेश प्रोत्साहन परिषद की बैठक हो गई और उसमें 12,744 करोड़ रुपये के 99 प्रस्तावों को मंजूरी दे दी गई, जिसमें अकेले 59 प्रस्ताव इथेनाल के हैं। इसके अतिरिक्त, तीन दिनों में नए मिले 87 प्रस्तावों की जानकारी भी सार्वजनिक कर दी गई। अब शाहनवाज हुसैन के पास बताने के लिए कुछ भी नहीं बचा। इसको लेकर भी तरह-तरह की चर्चा है। कुछ इसे शाहनवाज की तेजी पर ब्रेक के रूप में देख रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि ये तो होना ही था।