एंबुलेंस गिरोह के भरोसे चलते हैं कई निजी नर्सिंग होम, मरीजों का होता है सौदा, एक रोगी लाओ 25000 ले जाओ का ऑफर

पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार सिलीगुड़ी। उत्तर बंगाल के सभी 8 जिलों के अलावा बिहार, भूटान, सिक्किम, बांग्लादेश तथा नेपाल से चिकित्सा कराने यहां रोगी और उनके परिवार आते हैं।  उन्हें क्या मालूम कि निजी चिकित्सा की चकाचौंध में एंबुलेंस गिरोह और इससे जुड़े चिकित्सा कर्मी उनका सौदा करने में लगे हैं। सुबे की मुख्यमंत्री खूद स्वास्थ्य व्यवस्था की बागडोर संभाले हुए हो। ऐसे में यहां चिकित्सा के नाम पर अंधेरगर्दी थमने का नाम नहीं ले रही। तो इसे अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजा टके सेर खाजा वाली कहावत से तुलना करना अतिशयोक्ति ही होगी।

बालू,भू-माफिया, पत्थर माफिया, सिंडिकेट माफिया तो उत्तर बंगाल में आपने सुना होगा, लेकिन इन दिनों मेडिकल माफिया भी महामारी काल में सक्रिय है। इसमें एक पूरी चेन काम करती है। जिसकी शुरूआत झोलाछाप डॉक्टरों से होती है और अस्पतालों तक पहुंचती है। मरीज एम्बुलेंस, मोनोपॉली आयटम (दवाओं), जांच के नाम पर पूरी तरह कंगाल हो जाता है। जब मरीज की जेब खाली हो जाती है, वह गंभीर स्थिति में होता है तो

 उसे सरकारी अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। प्रशासन इस मेडिकल माफिया की कमर तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहा है।सिलीगुड़ी और आसपास के क्षेत्रों में कुल 54 निजी नर्सिंग होम रोगियों की चिकित्सकीय सेवा दे रहे हैं।

शहर  में काफी ऐसे नर्सिंग होम हैं जहां ठेके पर डॉक्टर और कमीशन पर मरीज का इलाज होता है। शहर में कई ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जिनमें ट्रैंड स्टाफ तो दूर डॉक्टर भी किराए के हैं। जो केवल स्पेशल विजिट चार्ज पर बुलाए जाते हैं। बीएएमएस, बीएचएमएस डॉक्टर यहां पर रखे गए हैं। नॉन मेडिको ऐसे अस्पतालों का संचालन कर रहे हैं। जांच और दवाओं के नाम पर मरीज कंगाल हो जाता है।

कोविड-19 महामारी के समय में एंबुलेंस किराया को लेकर वह हल्ला मचा तो नया फंडा इन दिनों काफी तेजी से चिकित्सा जगत को शर्मसार कर रही है। एंबुलेंस दलालों को ऑफर है एक पेशेंट लाओ, और 25000 नगदी लेकर जाओ। यही कारण है कि 1-1 कोविड-19 संक्रमित के बिल कम से कम तीन लाख और ज्यादा 20 से 27 लाख तक पहुंच रहा है। यह पूरे सिस्टम पर काला धब्बा है। जिसे रोगी और उनके परिजन ताउम्र नहीं भूल सकते।

जिंदगी से मोक्ष तक दलाल है सक्रिय

मरीज बिकते है बोलो खरीदोगे। चौंकिए नहीं...। ये हकीकत है...। इनकी दुकानें हैं। मंडियां हैं, जहां बाकायदा सौदा होता है। दूसरे जिलों से लाए गए मरीजों की बोली लगती है। निजी अस्पताल से ऑफ र दिया जाता है। एक मरीज के इलाज में वसूली जाने वाली रकम का 30- 35 प्रतिशत हिस्सा।

आजकल इन मंडियों में यही भाव चल रहा है। आप इसे दलाली कहिए, कमीशन कहिए पर ये धंधेबाजों के लिए इंसेंटिव है। दलाली के इस खेल में मरीज और उसके परिजन भले ही रोना रो रहे हो पर कई ऐसे दलाल हैं जिन्हें एक पेशेंट के बदले 80 से हजार रुपए मिल रहे हैं। इसलिए भी चिकित्सा के नाम पर दलाली प्रथा परवान चढ़ा रही है।

आए दिन ऐसी खबरें आती हैं कि मरीज को बिल भुगतान न करने पर बंधक बना लिया गया। उससे वसूली की। दलाल निजी अस्पताल तक पहुंचा गया। स्वास्थ्य सेवा में भी माफिया हावी हो गए हैं। गलत होता देख कर भी इसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते। स्वास्थ सेवा व्यापार में तब्दील हो गया है। डॉक्टर हो या दवा कारोबारी सभी अपनी जेब भरने में लगे हैं। 

कई राज्यों तक फैले हैं इसके तार

शहर में मरीजों की दलाली का धंध फल फूल रहा है। मरीजों को निजी अस्पताल में पहुंचाने पर दलालों को मोटी रकम मिलती है। इसमें एंबुलेंस संचालक,निजी डाक्टर से लेकर सरकारी अस्पतालों के डाक्टर तक संलिप्त हैं। कुछ सरकारी डाक्टरों ने तो नॉन मेडिको के साथ मिलकर अस्पताल भी डाल रखें हैं, जो सरकारी अस्पताल से खुद ही मरीजों को भेजते ट्रांसफर करते हैं। इन लाेगाें ने दूसरे के नाम पर खुद का अस्पताल खोल रखा है, साथ ही मरीजों को भेजने के लिए दलाल भी नियुक्त कर रखे हैं। यह कमीशन का खेल जिस तरह से खेला जा रहा है, उससे मरीजों काे जान माल का नुकसान उठाना पड़ता है। सिलीगुड़ी जिला अस्पताल नोबेल मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एंबुलेंस का एक बड़ा गिरोह सक्रिय है। लगभग ऐसे एंबुलेंस है जो डॉक्टरों के इशारे पर सिर्फ उत्तर बंगाल ही नहीं बल्कि कई अन्य राज्यों से जोड़कर इस धंधे को अंजाम देते हैं।

इसमें उत्तर बंगाल के कुचबिहार, अलीपुरद्वार, जयगांव, हासीमारा, बानरहाट, जलपाईगुड़ी, मालदा, रायगंज, नागराकाटा, इस्लामपुर, बालूरघाट, पानीटंकी, खोड़ीबाड़ी, बतशी, बागडोगरा, बिधाननगर,हल्दीबारी, धुपगुरी, मैनागुड़ी,दालकोला, दार्जिलिंग, कालिमपोंग, कर्सियांग, गोरुबथान, नेपाल के झापा, इलाम, भद्रपुर,काकरभिठा,बिहार के किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, गलगलिया,गुलाबबाग, बारसोइ, अररिया, फारबिसगंज, मधेपुरा, सुपौल, बहादुरगंज, ठाकुरगंज, पोठिया, आजादनगर ,कसबा सहित अन्य कई राज्यों से इनका सीधा संपर्क होता है।

इलाज की आधी रकम दलालों की जेब में

निजी अस्पताल 20 प्रतिशत से लेकर इलाज की आधी रकम दलाली में देने का ऑफर दलालों को देते हैं। यह लाेग शुरू के तीन दिन मरीजों को इलाज नहीं देते, बल्की उसे जिंदा रखने का काम करते हैं। इन तीन दिन में वह दलाली में दी गई रकम एंठते हैं। इस दौरान जब मरीज की हालत यदि अधिक बिगड़ती है तो उसे सरकारी अस्पताल का रास्ता दिखा दिया जाता है। 50 फीसदी निजी अस्पताल मानक पूरे नहीं करते। फायर का एनओसी तक नहीं है फिर भी धड़ल्ले से चल रहे हैं। ज्यादातर में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न सुविधाएं। कमीशन देकर मरीज मंगाए जाते हैं और उनका इलाज भी ठेके पर बुलाए गए डॉक्टर करते हैं। यह आरोप नहीं बल्कि ग्रहण जांच पड़ताल की जाए तो यह सच्चाई सामने आएगी।

क्या है इसका चेन सिस्टम

ग्रामीण इलाकों के झोलाछाप डॉक्टर एंबुलेंस दलाल गिरोह से मिलकर भी बड़े नर्सिंग होम के लिए एजेंट का काम करते हैं। मरीज को अपनी मर्जी के अस्पताल तक भेजना इनका काम होता है। इसके एवज में मोटा कमीशन मिलता है। दरअसल अंचल के गांव व छोटे जगहों पर  बेहतर अस्पताल नहीं है। जिसका लाभ इन झेलाछाप डॉक्टरों को मिलता है। यह बेहतर इलाज के लिए सिलीगुड़ी के अस्पताल में भेज देते हैं।एम्बुलेंस चालक भी इसमें शामिल हैं। यह लोग मरीज को कमीशन के चक्कर में निजी अस्पतालों तक पहुंचाते हैं। इनका काम सरकारी अस्पताल की अव्यवस्थाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना होता है। जिससे अटेंडेंट घबराकर खुद ही निजी अस्पताल में ले जाने की गुहार लगाने लगे।

दवा और जांच के नाम पर भी अंधेरगर्दी

निजी अस्पतालों ने खुद के मेडिकल स्टोर खोल रखे हैं। यहां तक की क्लीनिक खोलकर बैठे डॉक्टरों की भी मेडिकल स्टोर से साठगांठ है। कुछ डॉक्टर अपने रिश्तेदारों के नाम से कंपनी रजिस्टर्ड करवाकर दवाएं तैयार करवाते हैं। तो कुछ दवा कंपनियों के एजेंट के साथ सांठगांठ किए हुए रहते हैं।यह दवाएं भी निर्धारित मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं। दवाओं का मूल्य भी फार्मूले पर बनी अन्य दवाओं के मुकाबले अधिक होता है। यह दवाएं नजदीकी मेडिकल स्टोर पर ही मिलती हैं। पर्चे पर 5 में से दो दवाएं रिश्तेदार की कंपनी की लिख दी जाती हैं। यह दवाएं कहीं नहीं मिलती, इसलिए मरीज को क्लीनिक के नजदीक के मेडिकल स्टोर से ही दवाएं खरीदना पड़ती है। शहर में चल रहे कुछ रक्त, अल्ट्रासाउंड, सीटी स्केन एवं एमआरआई सेंटर भी इस खेल में शामिल हैं। डॉक्टर जांच लिखने के साथ ही यह भी बताते हैं कि जांच कहां पर कराना है। यदि मरीज कहीं दूसरी जगह जांच करा भी आए तो रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया जाता है कि यहां की रिपोर्ट सही नहीं आती है। जांच के नाम पर भी मोटा कमीशन का खेल चलता है।