आखिर कब थमेगा बंगाल में हिंसा-प्रतिहिंसा का सिलसिला


प्रधान सम्पादक सुधांशु शेखर की टिप्पणी - सन्दर्भ: 'चुनाव बाद हिंसा'
 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत को विभिन्न दृष्टिकोणों से व्याख्यायित किया जा सकता है. कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे ममता के न केवल राज्य के शिखर पर आरूढ़ होने और राष्ट्रीय राजनीति में नये समीकरण का आधार और आरंभ मान रहे हैं तो कुछ इस चुनावी नतीजे को  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू मान रहे हैं. दोनों ही दृष्टिकोण निराधार नहीं हैं लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के पूर्व वर्तमान की चुनौतियों, उनके अतीत के संदर्भ, तत्कालीन कदमों की  प्रभावशीलता, उसकी सफलता तथा सरकार की नीयत के साथ वर्तमान में उनसे निपटने की रणनीतियों, राजनीतिक इच्छा शक्ति का गहन विश्लेषण अनिवार्य है. राष्ट्रीय स्तर पर ममता के राजनीतिक प्रभाव, उनकी स्वीकार्यता, उसके नतीजे आदि पर विवेचन, निष्कर्ष पर पहुंचने के पूर्व यह जरूरी है कि राज्य की जनता की आशा, आकांक्षा और अपेक्षा पर वे कितना खरी उतरती हैं, युवाओं, महिलाओं, छात्र-छात्राओं, संगठित- असंगठित श्रमिकों, किसानों, व्यापारियों के हित के लिए क्या योजनाएं हैं. ममता के सामने जनाकांक्षाएं तो हैं ही, चुनौतियां भी कम नहीं हैं और उनकी आंच शपथ-ग्रहण के पहले ही उन्हें तपाने लगी है. दो मई को नतीजों की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक हिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है. भाजपा और तृणमूल के बीच शुरू यह खूनी खेल दो दिनों में ही 11 जानें ले चुका है. भाजपा का दावा है कि उसके 9 कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या तृणमूल के गुंडों ने की है जबकि तृणमूल का कहना है कि यह सब भाजपा की अंदरूनी कलह का नतीजा है. राज्य में हिंसा से माहौल गर्म बना हुआ है. राज्य में व्यापक पैमाने पर आगजनी भी हुई है. मंगलवार को बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने बताया कि इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे बात की और बंगाल में कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता जतायी. राज्यपाल ने कहा कि चुनाव परिणाम आने के बाद राज्य में बर्बर हिंसा, आगजनी, लूटपाट और हत्याएं बेरोकटोक जारी हैं. राज्य में कानून-व्यवस्था को बहाल करना बहुत जरूरी है. हिंसा की घटनाओं पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बंगाल सरकार से रिपोर्ट मांगी है.

साथ ही हिंसा और आगजनी का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया है. भाजपा नेता गौतम भाटिया ने अदालत में याचिका दायर कर हिंसा की सीबीआई जांच की मांग की है. याचिका में कहा गया है कि बंगाल में महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया है. भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले किये गये और मार डाला गया. लिहाजा सीबीआई को हिंसा की जांच करनी चाहिए. हिंसा की ये घटनाएं दो मई से ही शुरू हुईं और राज्य का हर जिला न्यूनाधिक प्रभावित है. उत्तर बंगाल के कूचबिहार, दिनाजपुर, नदिया, हुगली, उत्तर 24 परगना आदि जिले विशेष प्रभावित हैं.

नड्डा की कोलकाता यात्रा: इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा मंगलवार को कोलकाता पहुंचे. वे दो दिन राज्य में रहकर हिंसाग्रस्त क्षेत्रों  का दौरा करेंगे. नड्डा ने कहा कि पश्चिम बंगाल की ये घटनाएं हैरान करती हैं, चिंता में डालती हैं. आजाद भारत में चुनाव के बाद इतनी असहिष्णुता आज तक नहीं देखी. इस मुश्किल वक्त में कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होकर लोकतांत्रिक तरीके से लड़ाई लड़ने के लिए हम कृतसंकल्प है. हम उनकी विचारधारा की लड़ाई निर्णायक मोड़ तक पहुंचाएंगे. उधर, राष्ट्रीय महिला आयोग ने नंदीग्राम में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को लेकर स्वत: संज्ञान लिया है. आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने राज्य पुलिस महानिदेशक को पत्र लिखकर अभियुक्तों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है.

इस बीच, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाएं नयी नहीं हैं और चुनाव बाद तनाव सामान्य बात है लेकिन इतने व्यापक स्तर पर हिंसा से साफ है कि ये राज्य प्रायोजित हैं. एक दर्जन हत्याएं हुईं, हजारों घर फूंक दिये गये और ममता किसी प्रकार का दायित्व लेने, लोगों को संरक्षण प्रदान करने, कानून-व्यवस्था की स्थिति सुधारने के बदले दोषारोपण कर रही हैं. भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि तृणमूल के गुंडों को हिंसा और उत्पात के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौन सहमति मिली हुई है. उनके कई नेता खुलेआम हिंसा के लिए अपने लोगों को भड़का रहे हैं. 
   
ममता ने की शांति की अपीलः मुख्यमंत्री बनर्जी ने हिंसा की लगातार आ रही खबरों के बीच सार्वजनिक रूप से सभी से शांति बनाए रखने की अपील की और किसी प्रकार के उकसावे से बचने तथा पुलिस को सूचना देने को कहा. साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों ने चुनावों के दौरान तृणमूल समर्थकों पर काफी अत्याचार किए. परिणाम घोषित होने के बाद भी भाजपा ने कुछ क्षेत्रों में हमारे समर्थकों पर हमला किया. ममता ने राज्य की कानून व्यवस्था की स्थिति पर अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श भी किया.

संवेदनशीलता की नितांत आवश्यकताः बंगाल में राजनीतिक हिंसा की घटनाएं नयी नहीं है लेकिन सबसे दुखद पहलू यह है कि सभी राजनीतिक दल इन हिंसक घटनाओं, आगजनी, बलात्कार, भय से पलायन या घर छोड़ने के लिए बाध्य करने आदि की घटनाओं के लिए एक दूसरे पर आरोप- प्रत्यारोप झोंकते रहते हैं लेकिन कोई मिलकर इसका समाधान ढूढने की दिशा में कोई पहल नहीं करता. दो दिन की घटनाओं पर केंद्र सरकार की चिंता जायज है, उसे राज्य सरकार से जवाब तलब करने का भी संवैधानिक अधिकार है, स्थिति बिगड़ने पर वह आवश्यक हस्तक्षेप भी कर सकती है लेकिन किसी भी कदम में राजनीतिक प्रतिशोध या पक्षपात की भावना नहीं दिखनी चाहिए. न तो केंद्र सरकार को और न ही राज्य सरकार को ऐसे मामले में असंवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए. नड्डा का यहां आना और पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर उनके प्रति संवेदना व्यक्त करना, विपत्ति में उनके साथ खड़े होना पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनका कर्तव्य है और उनकी संवेदनशीलता का परिचायक है. इसके साथ ही उन्हें परिस्थिति को और भयावह होने से रोकने के लिए राज्य सरकार को सहयोग और परामर्श भी देना चाहिए. लेकिन जिस प्रकार उनके राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा का यह कहना अनुचित है कि तृणमूल के गुंडों को हिंसा और उत्पात के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौन सहमति मिली हुई है. ठीक उसी प्रकार ममता का चुनाव के दौरान हुई घटनाओं का वर्तमान हिंसक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में उल्लेख करना ठीक नहीं है. शासक यदि असंवेदनशील हुआ तो अराजकता फैलती है, धीरे-धीरे उसके प्रति लोगों की आस्था, विश्वास, समर्थन का क्षरण होता है और भारतीय लोकतंत्र का इतिहास गवाह है कि एक बार विश्वास गंवा चुकी पार्टी या नेता या तो संभल नहीं पाता या संभलने में दशक बीत जाते हैं. मुख्यमंत्री के रूप में ममता के लिए अपनी जनता की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, इसमें दलगत पहचान वाली बात नहीं होनी चाहिए. आशा है बुधवार के शपथ ग्रहण के बाद इस मामले को वे पहली प्राथमिकता देंगी.

कोरोना महामारीः ममता ने स्वयं कहा है कि उनकी पहली प्राथमिकता कोरोना महामारी से निपटने की है. महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, मप्र, उप्र, बिहार सहित बंगाल में भी कोरोना महामारी भयावह रूप ले चुकी है और इस पर अविलंब नियंत्रण की नितांत आवश्यकता है. लड़ाई कठिन है लेकिन एक बार हम इसे परास्त कर चुके हैं और सरकार की संवेदनशीलता, समुचित चिकित्सा व्यवस्था, जन सहयोग, सावधानी बरत कर इस पर पार पाया जा सकता है. अभिनेता अबीर चटर्जी ने लिखा है कि जीत विनम्रता के साथ मनाएं. जश्न से ज्यादा महत्वपूर्ण कोरोना से जंग है.  
 
2006 में ममता की पार्टी को वाम मोर्चे से कम सीटें मिली थीं, तब बुद्धदेव भट्टाचार्य ने जनता के जनादेश का निहितार्थ नहीं समझा था, अपनी नीतियों में आवश्यक परिवर्तन कर उसे जनाकांक्षाओं के अनुकूल ढालने की कवायद नहीं कर भारी गलती की थी जिसका खामियाजा उन्हें 2016 में चुकाना पड़ा था. ममता को भी जनता ने विशाल बहुमत देने के साथ एक सुनहरा अवसर दिया है कि वह अपनी गलतियों को सुधारें, उन नीतियों की समीक्षा करें, जिनकी बार-बार आलोचना हुई है और जिनसे जनता को भी अनहद असुविधाओं और संकटों का सामना करना पड़ा है. जिन क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है, वे स्पष्ट हैं, पहले से मौजूद हैं और पक्ष-विपक्ष के निशाने पर रही है पार्टी. ममता का दूसरा कार्यकाल भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा हुआ रहा, सिंडिकेट राज, तोलाबाजी, कटमनी के आरोप लगे. ममता के लिए यह अच्छी बात है कि आरोपों से घिरे अधिसंख्य नेता भाजपा में शामिब हो गये हैं. ममता को कचरा साफ करने की जहमत नहीं उठानी पड़ेगी. ममता को चाहिए कि वे मंत्रिमंडल तथा अन्य स्थानों पर नये, समर्पित, ईमानदार, कर्मठ युवा नेतृत्व को जिम्मेदारी सौंपे. भाजपा से प्रतिशोध लेने या धमकी देने के किसी भी प्रलोभन में न पड़ें, बदले की भावना कई बार राजनीति में पतन का कारण बन जाती है, साथ ही आवश्यक विषयों से ध्यान भटक जाता है. ममता का भी लक्ष्य सबका साथ, सबका विकास होना चाहिए. ममता को पार्टी में उन नये चेहरों को प्रोत्साहन और अवसर देना चाहिए जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास, क्षमता और दक्षता रखते हों. इससे एक नया नेतृत्व पनपेगा और वे भारी संख्या में भाजपा में गये नये समर्थकों का दिल भी जीत सकेंगी, पार्टी में वापस ला सकेंगी. करिश्मायी लीडर पर आश्रित पार्टी की उम्र लंबी नहीं होती. तृणमूल समर्थकों तथा कई अन्य खेमों में राष्ट्रीय स्तर पर उनकी महती भूमिका की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है लेकिन उसके लिए जरूरी है कि ममता इंतजार करें, घर संभाले, संवारें, घर के लोगों को सर उठाकर जीने के अवसर प्रदान करें, फिर देखें आकाश की ओर, पायेंगी सारा आकाश हमारा है.