West Bengal Assembly Elections 2021: बंगाल चुनाव के बहाने एक राजनीतिक सबक

हर राजनीतिक पार्टी को अपनी नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर सत्ता में पहुंचकर जन कल्याण के अपने अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए एक करिश्माई नेतृत्व की जरूरत होती है, लेकिन सिर्फ यही काफी नहीं है। पार्टी को कामयाब बनाने यानी उसे सत्ता तक पहुंचाने में उस बड़े नेता के पीछे एक मजबूत और विस्तृत संगठनात्मक ताकत की जरूरत होती है। एक ऐसा संगठन जो तमाम गुटों में बंटे होने के बावजूद समय आने पर विपक्ष के सामने एक ठोस चट्टान की तरह खड़ा हो जाए।

दरअसल, करिश्माई नेता और मजबूत संगठन एक दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों में चोली-दामन का साथ होता है। एक के बिना दूसरे का कोई अर्थ नहीं होता है। इस बात को बंगाल की मुख्यमंत्री और तीसरी बार सत्ता हासिल करने के लिए लड़ रहीं ममता बनर्जी से बेहतर कौन समझ सकता है, जो इस समय संघर्षो से भरे अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा से गुजर रही हैं। आठ चरणों में फैले बंगाल के विधानसभा चुनाव में चार चरणों का मतदान संपन्न होने के बाद यह धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा है कि तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी अपनी राजनीतिक जमीन खो रही हैं। उनका करिश्मा तो कमोबेश कायम है।

खासकर महिला वोटरों के बीच उनकी लोकप्रियता में कोई खास कमी नहीं दिख रही है, लेकिन पार्टी के अंदर सबकुछ ठीक नहीं है। चौथे चरण के मतदान के दिन तृणमूल कांग्रेस के सलाहकार प्रशांत किशोर उर्फ पीके के लीक हुए ऑडियो चैट ने पार्टी की ढंकी-छिपी हकीकत से परदा हटा दिया है। क्लब हाउस नामक एक एप पर हुई इस चैट में चुनिंदा पत्रकारों से बातचीत में वे खुद भारतीय जनता पार्टी के लगातार बेहतर होते प्रदर्शन की ताकीद करते हुए सुने जा सकते हैं। चूंकि इस एप पर चैट में सिर्फ आमंत्रित व्यक्ति ही शामिल हो सकता है, इसलिए कहा जा सकता है कि उसे उनके किसी विश्वासी व्यक्ति ने ही लीक किया होगा।

बहरहाल, प्रशांत किशोर के इस विस्फोटक वार्तालाप के सामने आने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पीके को साथ लेना ममता की बड़ी भूल साबित होने जा रही है। इसके लिए दो मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने का इंतजार करना होगा, लेकिन इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि पीके के कारण तृणमूल कांग्रेस में जबरदस्त असंतोष है। ममता के भतीजे और डायमंड हार्बर से लोकसभा सदस्य अभिषेक बनर्जी हर काम पीके की सलाह से कर रहे हैं। हालत यह है कि ममता बनर्जी अब मुखौटा मात्र रह गई हैं, पार्टी की कमान अब पूरी तरह से भतीजे के हाथ में आ चुकी है। इस कारण से पार्टी में एक बड़ा तबका लंबे समय से खुद को उपेक्षित और अपमानित महसूस कर रहा है। उनमें से कई बड़े नेता भारतीय जनता पार्टी में जा चुके हैं। उनमें से सुवेंदु अधिकारी, राजीब बनर्जी और वैशाली डालमिया जैसे दर्जनों नेता इस विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ओर से तृणमूल के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं। पार्टी में जो बचे हैं, वे प्रशांत किशोर की विदाई का इंतजार कर रहे हैं।

कहना न होगा कि ऐसे असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं वाली पार्टी को आखिरकार चुनावों में इसकी कीमत चुकानी ही पड़ती है। कायदे से देखा जाए तो राजनीतिक पार्टयिों खासकर क्षेत्रीय दलों को पीके जैसे चुनावी रणनीतिकारों से काम लेने की कला नए सिरे से सीखनी होगी। ये आंकड़े जुटाने, उनका विश्लेषण करने और उसके आधार पर सलाह देने तक तो ठीक हैं, लेकिन जब पार्टी के फैसलों में उनकी दखलंदाजी बढ़ने लगती है तो नतीजा अच्छा नहीं होता है। पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती देने वाले स्तंभ एक-एक कर ढहने लगते हैं।

देश की राजनीतिक दिशा और दशा को बदलने वाले 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘चाय पर चर्चा’ से चíचत हुए पीके ने भाजपा की जीत में अपनी भूमिका को लेकर बढ़-चढ़ कर दावे किए। पीके को इसका फायदा भी मिला। उनका 2018 में न सिर्फ नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) में प्रवेश हुआ, बल्कि उन्हें उपाध्यक्ष बनाते हुए पार्टी में नंबर दो की हैसियत भी दे दी गई। वहां भी इसका विरोध शुरू हुआ। वर्षो से पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचने वाले नेताओं का स्वाभिमान जाग उठा और आखिरकार छह महीने बाद ही जदयू से उनकी विदाई हो गई। वे न सिर्फ पार्टी से बाहर किए गए, बल्कि नीतीश के चुनावी रणनीतिकार भी नहीं रहे। उनके बिना ही भाजपा-जदयू गठबंधन ने 2020 के अक्टूबर-नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में सत्ता विरोधी मजबूत लहर का मुकाबला करते हुए जीत हासिल की।

प्रशांत किशोर अब ममता की नैया पार लगाने के दावे कर रहे हैं और बंगाल में चुनाव से पहले वे कह चुके हैं कि अगर भारतीय जनता पार्टी को 100 या उससे ज्यादा सीटें आईं तो वे चुनाव रणनीतिकार का अपना काम छोड़ देंगे। अब वे ताजा चैट में भारतीय जनता पार्टी के जीतने का अनुमान लगा रहे हैं। जाहिर है, वे रणनीतिकार की अपनी भूमिका और उसकी सीमाओं को भूलकर राजनेता की तरह व्यवहार करने लगे हैं।

इस तरह की परिस्थितियों के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को समय रहते सतर्क हो जाना चाहिए, क्योंकि वे प्रशांत किशोर के साथ अगले विधानसभा चुनाव की रणनीति का कांट्रैक्ट कर चुके हैं। कैप्टन अमरिंदर सिंह को उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव का कांग्रेस का अनुभव तो याद होगा, जहां ‘खाट पर चर्चा’ के बहाने पार्टी की खाट ही उलट गई और ऐसी उलटी की सीधे होने का नाम नहीं ले रही है।