बंगाल की हिंसक राजनीति से ममता होती हैं मजबूत


लोकनाथ तिवारी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में चुनावी रैली के दौरान लगी चोट पर राजनीति तेज हो गई है. ममता बनर्जी ने इसे हमला बताया है वहीं विरोधी इसे नाटक करार दे रहे हैं. विरोधियों का आरोप है कि ममता बनर्जी जब वहां पहुंचीं, तब उनको देखने के लिए भीड़ जमा हो गई और लोग उन्हें घेरकर खड़े हो गए. इस दौरान उन्हें गर्दन और पैर पर चोट लगी. इस दौरान किसी ने उन्हें धक्का नहीं दिया. उनकी कार धीरे-धीरे चल रही थी. ममता बनर्जी की कार का दरवाजा खुला था. दरवाजा एक पोस्ट से टकराने के बाद बंद हो गया. किसी ने धक्का नहीं दिया और न ही मारा. उस समय दरवाजे के पास कोई नहीं था.

ममता बनर्जी की मेडिकल रिपोर्ट में बताया गया है कि उनके बाएं पैर की हड्डियों में गंभीर चोट लगी है. साथ ही उनके दाहिने कंधे, गर्दन और कलाई में भी चोटें आई हैं. हादसे के बाद ममता बनर्जी ने सीने में दर्द और सांस फूलने की भी शिकायत की है. उनकी हालत स्थिर है और अगले 48 घंटों के लिए निगरानी में रखा जाएगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता के चोटिल होने से उनका चुनाव प्रचार प्रभावित होगा। अपनी पार्टी की इकलौती स्टार प्रचारक होने के नाते सभी सीटों पर ममता को चुनाव प्रचार करना है। पहले चरण में ममता स्वयं नंदीग्राम से उम्मीदवार हैं। ममता को जाननेवाले जानते हैं कि घायल ममता अपने विरोधियों पर भारी पड़ेगी। ममता बनर्जी ने कहा भी है कि वह अधिक समय तक अस्पताल में नहीं रहेंगी। जल्दी ही वह व्हीलचेयर से चुनाव प्रचार करेंगी। ममता के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी ने भी कहा है कि ममता बनर्जी को परास्त नहीं किया जा सकता। रविवार 2 मई को जब चुनाव परिणाम आयेगा तो बीजेपी बंगाल के लोगों की शक्ति को देख कर खुद को कोसेगी।  

बंगाल को पॉलिटिकल संत्रास यानि राजनीतिक हिंसा के लिए सदा से जाना जाता है. पश्चिम बंगाल में हिंसा का संबंध केवल चुनाव से नहीं है, यहां चुनाव के पहले ही हिंसा शुरू हो जाती है. इस राज्यं में दशकों से राजनीतिक हिंसा होती रही है. पश्चिम बंगाल में हिंसा और राजनीति एकदूसरे के पूरक हैं. जब भी पश्चिम बंगाल की राजनीति की बात होती है तो यहां की हिंसक राजनीति की चर्चा अवश्य होती है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां हिंसा के लिए पुलिस को भी उतना ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है जितना उग्र कार्यकर्ताओं को. यहां की पुलिस सरकार का ही नहीं बल्कि पार्टी के दास की तरह काम करती है. पहले माकपा के कैडरों की सुनती थी अब टीएमसी के छुटभैया नेता भी थानों में धाक जमाते देखे जाते हैं. पश्चिम बंगाल में हिंसा की राजनीति में सत्ताधारी पार्टी को बढ़त हासिल होती रही है. पंचायत, नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा के विगत चुनाव इसके प्रमाण हैं. पहले वाममोर्चा के सामने विपक्षी टिक नहीं पाते थे. 34 सालों तक का वामशासन जब समाप्त हुआ और ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी की सरकार बनी तो बंगाल में कायाकल्प तो हुआ लेकिन चुनावी हालात में केवल नाममात्र का परिवर्तन हुआ. हिंसक तत्वों ने वाममोर्चा का दामन छोड़ टीएमसी की शरण ले ली. राजनीतिक हिंसक गतिविधियों में भी एक परिवर्तन देखने को मिला है. वाममोर्चा के जमाने में चुनाव के दिन या चुनाव के बाद विरोधियों को निशाना बनाया जाता था जबकि अब चुनाव के पहले ही हिंसक घटनाएं देखी जा रही हैं. 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद स्थिति में एकबार फिर परिवर्तन देखने को मिल रहा है. बीजेपी के 18 सांसदों के निर्वाचित होने के बाद दबंग नेता और कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग टीएमसी का साथ छोड़कर विरोधी खेमे का रुख कर चुका है. यहीं कारण है कि अब सत्ताधारी हिंसा का उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाने लगा है. 

वाममोर्चा के जमाने में कैडरों को चुनाव में जो साइंटिफिक रिगिंग के लिए भी जाना जाता था. कैडरों का एक वर्ग जब टीएमसी में शामिल हो गया तो जो काम वे वाममोर्चा के लिए करते थे, अब टीएमसी के लिए करने लगे. जानकार बताते हैं कि साइंटिफिक रिगिंग भी एक तरह की हिंसा ही है. इसमें मतदान की प्रक्रिया शुरू होते ही विरोधियों को प्रचार नहीं करने देना, दीवार लेखन से लेकर बूथ स्लिप देने में बाधा, विरोधियों को नामांकन नहीं करने देना, मतदान के दिन बूथ में विपक्ष का एजेंट नहीं बैठने देना. कतार में दर्जनों की संख्या में खड़े होकर लाइन को आगे नहीं बढ़ने देना. अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने के लिए इलाके के लोगों को डराना व धमकाना. पुलिस व प्रशासन का उपयोग कर विरोधियों को चुप रहने के लिए बाध्य करना होता है. 

पश्चिम बंगाल में विरोधी पार्टी की रैली या सभा हो, बड़े नेता का दौरा हो, कोई विरोध प्रदर्शन हो तो हिंसा होती ही होती है. ऐसा नहीं है कि यह टीएमसी या ममता बनर्जी के शासनकाल में ही हो रहा है. पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की शुरुआत नक्सल आंदोलन के साथ हुई. 1960 से 1970 के बीच शुरू हुई नक्सली हिंसा धीरे-धीरे राजनीतिक हिंसा में बदल गई. पिछले चार दशकों में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में 28 हजार से ज्यादा लोगों की जानें गयी हैं. राजनीतिक हिंसा का दौर आज भी जारी है. राज्य में विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा हो चुकी है. प्रचार जोरों पर है साथ ही हिंसक घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं. 

पश्चिम बंगाल में हिंसा का दौरा 1960 के बाद शुरू हुआ. शुरू में इसके पीछे नक्सली उग्रवादियों का हाथ था. 1972 से 1977 तक तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय के नेतृत्व में नक्सलियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में नक्सली या तो मारे गये या निष्क्रिय कर दिये गये. इसके बाद साल 1977 में वाममोर्चा की सरकार आई जो 2011 तक यानि 34 सालों तक रही. इन 34 वर्षों के दौरान राज्य में राजनीतिक हिंसा में 28 हजार लोग मारे गए. 2006 से 2008 तक राज्य में उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण के खिलाफ सिंगुर और नंदीग्राम में आंदोलन चला जो वाममोर्चा शासन के लिए घातक साबित हुआ. नंदीग्राम में पुलिस की गोलियों से 14 लोग मारे गये थे. इसी आंदोलन के बाद 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी. ममता बनर्जी के 10 साल के कार्यकाल में भी राजनीतिक हिंसा कम नहीं हुई है. 

हाल के दिनों में हिंसक वारदातें बढ़ गयी हैं. पिछले साल 13 जुलाई 2020 को उत्तर दिनाजपुर ज़िले में हेमताबाद क्षेत्र के विधायक देवेंद्र नाथ रॉय की लाश बीच बाज़ार में फंदे से लटकी मिली. 2016 में सीपीएम के टिकट पर चुने गए रॉय पार्टी बदल कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. बीजेपी आरोप लगाती है कि तृणमूल कांग्रेस ने उनकी हत्या की, जबकि तृणमूल इसे आत्महत्या का मामला बताती है. वहीं 9 फ़रवरी 2019 को नदिया ज़िले की कृष्णागंज सीट से तृणमूल कांग्रेस के विधायक सत्यजीत बिस्वास पर सरस्वती पूजा के एक कार्यक्रम में दिन-दहाड़े गोलियां चलाई गईं. 4 अक्टूबर 2020 को उत्तर 24 परगना ज़िले के टीटागढ़ में बीजेपी के युवा नेता मनीष शुक्ला को सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया गया. थाने से महज़ 50 मीटर दूर हुई इस हत्या के लिए भी तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगा क्योंकि मनीष पहले टीएमसी के पार्षद थे.

2018 के मई महीने में पुरुलिया ज़िले में बीजेपी कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की लाश पेड़ से लटकी मिली थी. 10 दिसंबर 2020 को कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय के काफ़िले पर हमला हुआ था. 

ऐसा भी नहीं है कि हिंसा केवल दो पार्टियों के बीच ही होती है. कई जगहों पर यह पार्टी की गुटबाजी के कारण भी होती है. कई घटनाएं तो तृणमूल बनाम तृणमूल और पुराने बीजेपी बनाम नये बीजेपी के बीच हो रही है. वर्तमान में हिंसा के अधिकतर मामले सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच देखे जा रहे हैं. इससे एक बात तो स्पष्ट है कि बीजेपी ही सरकार को चुनौती दे रही है. 

राजनीति में अब हिंसा को खेल से जोड़ा जा रहा है. टीएमसी ने इस चुनाव में “खेला होबे” का नारा दिया है. बीजेपी भी इसी नारे को दोहरा रही है. अब खेल शुरू है, पता नहीं इस हिंसक खेल पर कब विराम लगेगा. 

(लेखक कोलकाता के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)