Bengal Assembly Elections 2021: बंगाल में अस्तित्व बचाने के उपाय में वाममोर्चा और कांग्रेस

बंगाल में पिछले तीन वर्षो का राजनीतिक कर्मकांड और मौजूदा सियासी घमासान यह बताने को काफी है कि विधानसभा चुनाव में सीधा मुकाबला किन दलों के बीच होने जा रहा है। राज्य में तृणमूल और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई है। ऐसे में राज्य की राजनीति में हाशिये पर खड़े माकपा नीत वाममोर्चा (वाम) और कांग्रेस के लिए इस बार का चुनाव अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद है। यह बात वाम और कांग्रेस नेतृत्व को भी पता है, इसलिए वे गठबंधन के जरिये मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में हैं। दो बड़े सवाल यह हैं कि क्या वाम-कांग्रेस गठबंधन लोगों के बीच तीसरे विकल्प के रूप में खुद को पेश करने में कामयाब हो पाएगा? इस गठबंधन का नेता कौन होगा? इनका जवाब न तो कांग्रेस और न कामरेड दे रहे हैं।

पिछले दिनों माकपा के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी ने यह कहकर अपनी मंशा जाहिर कर दी थी कि उनका मकसद सिर्फ भाजपा को हराना है। इसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या वाम-कांग्रेस गठबंधन चुनाव जीतने नहीं, बल्कि केवल भाजपा को हराने के लिए मैदान में उतरेगा? इस बयान को और बल तब मिला, जब पिछले सप्ताह तृणमूल के वरिष्ठ सांसद सौगत रॉय ने पत्रकारों से कहा, अगर वाममोर्चा और कांग्रेस वास्तव में भाजपा के खिलाफ हैं तो उन्हें भगवा दल की सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ लड़ाई में ममता का साथ देना चाहिए। भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष राजनीति का असली चेहरा ममता ही हैं।

बंगाल के माकपा और कांग्रेस नेताओं ने तृणमूल के इस प्रस्ताव को तत्काल ठुकरा दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने तो यहां तक कह दिया कि ममता को अपनी पार्टी तृणमूल का कांग्रेस में विलय कर देना चाहिए। वहीं माकपा नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा, अब तक ममता बनर्जी कहती थीं कि वामपंथी राज्य में खत्म हो चुके हैं तो फिर यह प्रस्ताव क्यों? उधर भाजपा वामपंथी वोटरों से मदद मांग रही है। इससे प्रमाणित होता है कि बंगाल की सियासत में आज भी वाम-कांग्रेस मजबूत ताकत हैं और आगामी विधानसभा चुनाव में तृणमूल और भाजपा दोनों को हराकर सरकार बनाएगी।

वामपंथियों और कांग्रेस नेताओं के दावे पर गौर करें तो सब स्पष्ट हो जाता है। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में भी वाम-कांग्रेस ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। इसके बावजूद तृणमूल को 211 सीटें मिलीं और वाम-कांग्रेस के खाते में महज 76 सीटें आईं। वाम को 32 और कांग्रेस को 44 सीटें मिली थीं, लेकिन इसके बाद तृणमूल ने जिस तरह से कांग्रेस और वामपंथी दलों को तोड़ा और उनके विधायकों-नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल किया, उससे दोनों दलों की सांगठनिक स्थिति दयनीय होती चली गई। कई जिलों में संगठन के नाम पर बमुश्किल दो-चार लोग ही बचे हैं।

परिणामस्वरूप 2018 के पंचायत चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा बंगाल में तेजी से प्रमुख विरोधी दल के रूप में उभरी और कांग्रेस-वाम क्रमश: तीसरे और चौथे नंबर पर पहुंच गईं। वोट शेयर में भी भाजपा ने लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। लोकसभा चुनाव में तृणमूल को 43.6 फीसद तो भाजपा को 40.6 फीसद वोट मिले। इसने भाजपा का विधानसभा चुनाव के लिए मनोबल बढ़ाया। अब भाजपा विधानसभा चुनाव के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। वहीं अपनी सियासी जमीन खो चुकी वाम-कांग्रेस एक-दूसरे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने के सपने संजो रहे हैं। सीट समझौते को लेकर वाम-कांग्रेस के बीच बैठक हो रही है। रविवार को भी सीट बंटवारे को लेकर बैठक हुई। यहां परेशानी कांग्रेस और माकपा दोनों के लिए कमजोर संगठन है। यही नहीं, कांग्रेस बिहार विधानसभा चुनाव की गलती दोहराना नहीं चाहती। उसकी नजर जीत की संभावना वाली सीटों पर है।

वहीं वाम को 2016 का भय सता रहा है, क्योंकि कम सीटों पर चुनाव लड़कर कांग्रेस पिछली बार 44 सीटें जीतने में सफल हो गई थी और वाम अधिक सीटों पर लड़कर महज 32 सीटें ही जीत पाई थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां कहीं अलग हैं। दरअसल भाजपा व एआइएमआइएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी को साथ मिलाकर मैदान में उतरने का एलान कर दिया है। ऐसे में वाम-कांग्रेस की जद्दोजहद सफल होगी या विफल, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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