Bengal Politics: बंगाल विधानसभा चुनावी संग्राम में महापुरुषों का नाम पकड़ रहा जोर

बंगाल विधानसभा चुनाव रोचक मोड़ लेता जा रहा है। पहली बार चुनावी संग्राम में महापुरुषों का नाम जोर पकड़ रहा है। भाजपा हो या तृणमूल, दोनों दल अपना-अपना काम बनाने को महापुरुषों का नाम खूब ले रहे हैं। इसे लेकर आम जनता भ्रमित जरूर हो रही है कि आखिर चुनावी संग्राम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा या महापुरुषों के नाम पर? जिस तरह से भाजपा और तृणमूल के बीच युग पुरुष स्वामी विवेकानंद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर को लेकर होड़ मची है, वह यह बताने को काफी है कि चुनावी संग्राम किसके नाम पर होगा। यही नहीं, दोनों दी दल महापुरुषों का सम्मान और अपमान करने का हवाला देकर एक-दूसरे की सियासी जमीन भी खोदने की कोशिश कर रहे हैं।

एक ओर जितनी तेजी से ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेता भाजपा को बाहरी पार्टी बताकर बंगाली अस्मिता और संस्कृति नहीं समझने का आरोप लगाकर हमला बोल रहे हैं तो भाजपा नेता उतनी ही तेजी से खुद को बंगाल के महापुरुषों, अस्मिता व संस्कृति से जोड़कर जवाब दे रहे हैं। इसका सबसे बड़ा प्रमाण आज और 23 जनवरी को दोनों ही दलों की ओर से घोषित कार्यक्रम है। जनवरी में बंगाल की माटी के दो महापुरुषों स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती है। इस दोनों ही दिवसों को अभूतपूर्व बनाने के लिए एक तरफ भाजपा और केंद्र सरकार तो दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस और ममता सरकार ने अपने-अपने स्तर पर कई कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा कर दी है।

विवेकानंद जयंती को लेकर भाजपा ने भी मास्टर स्ट्रोक चला है। कोलकाता में विवेक का बुलावा (विवेकेर डाक) नाम से एक गैर राजनीतिक रैली आयोजित करने की घोषणा कर दी है, जिसमें पार्टी का झंडा नहीं होगा। इस रैली में राष्ट्रीय ध्वज और स्वामी विवेकानंद के पोस्टर, कटआउट होंगे। इस रैली में प्रदेश भाजपा के लगभग सभी नेता शामिल होंगे। हर जिले में भाजपा की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। वहीं ममता सरकार की ओर से रविवार से ही राज्यभर में तीन दिवसीय विवेक चेतना उत्सव शुरू किया गया है। पूरे सूबे में रैलियां, सेमिनार, प्रदर्शनी व फुटबॉल मैच जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।

इसी तरह से 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती को लेकर भी दोनों ही दलों के साथ केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से भव्य कार्यक्रम आयोजित करने की तैयारी की गई है। इसके लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 85 सदस्यीय उच्च स्तरीय कमेटी गठित की गई है, जिसमें ममता बनर्जी समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हैं। 23 जनवरी को प्रधानमंत्री के कोलकाता आने की भी चर्चा है और यहीं से वह नेताजी जयंती पर होने वाले कार्यक्रम का उद्घाटन करेंगे। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी नेताजी जयंती मनाने के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी, नेताजी के प्रपौत्र प्रो. सुगत बोस जैसे विशिष्ट लोगों को लेकर कमेटी बनाई है। वहीं नेताजी जयंती को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने की भी मांग की गई है। वहीं एनसीसी की तरह बंगाल सरकार नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आदर्श को ध्यान में रखकर जय हिंद वाहिनी का गठन करेगी, जो राज्य के स्कूल-कॉलेज और विश्वविद्यालयों में एनसीसी की तरह काम करेगा।

दोनों ही राजनीतिक दल वे सभी सियासी हथकंडे अपना रहे हैं, जिससे वे बंगाल की सत्ता पर काबिज हो सकें। दोनों ही दलों के लिए बंगाल के महापुरुष चुनावी सियासत के केंद्र बन चुके हैं, इसीलिए दोनों ही दलों के नेताओं की जुबां पर रवींद्रनाथ टैगोर, रामकृष्ण परमहंस, बंगाली अस्मिता के शिखर पुरुष गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसी विभूतियों के नाम बार-बार आ रहे हैं। मोदी की बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछें और बाल को लेकर तृणमूल नेता तंज करने लगे हैं कि वह खुद को टैगोर जैसा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा बार-बार बंगाल की जनता को याद दिला रहे हैं कि भाजपा की स्थापना बंगाली विभूति श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी।

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