Gaya Pitru Paksha Mela : कोरोना के कारण गया का पितृपक्ष मेला रद, ऑनलाइन पिंडदान के खिलाफ पंडा समाज


पितृपक्ष मेला के दौरान गयाजी के पंचकोसी में 54 पिडंवेदियां हैं, जहां श्रद्धालु अपने पितरों को पिडंदान व तर्पण करते हैं। प्राचीन काल से चली आ रही पितृश्राद्ध की यह धार्मिक परंपरा आज भी जीवंत है। लाखों की संख्या में लोग आते हैं। लेकिन ईस साल कोरोना के कारण पितृपक्ष मेला को रद कर दिया गया है। ऐसे में ऑनलाइन पिडंदान की व्यवस्था को कुछ लोग विकल्प बता रहे हैं। मगर गयाजी का पंडा समाज ऑनलाइन पिंडदान को धार्मिक मान्‍यता नहीं देता। इसके कई कारण पंडे बता रहे हैं।

गयाजी का पंडा समाज ऑनलाइन पिंडदान को नहीं मानता शास्‍त्रानुकूल

गयाजी का पंडा समाज ऑनलाइन पिंडदान को वैधानिक, व्यवहारिक और शास्त्रानुकूल नहीं मानता। गया जी में पिडंदान की धामिर्क मान्यता यह है कि....पुत्र पिंड परियोजनम....। यहां सात गोत्र को ही पिंड दिया जाता है, जिनमें नाना-नानी, मौसा-मौसी,फूफा-फूआ,बहन-बहनोई, सास-ससुर, गुरु और फिर स्वयं के खानदान हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार कोई तीसरा व्यक्ति कैसे कुल का पिंडदान करेगा। पीतल किवाड़ वाले गयापाल पंडा महेश लाल गुपुत ने स्पष्ट कहा कि शास्त्र बताता है कि पिता जी को तर्पण फल्गु नदी मे करने से ही मुक्ति होती है। यहां पिडंदान करते वक्त जिनके निमित होता है उनका नाम लिया जाता है।

ऑनलाइन की सोच को गयापाल गलत ठहराते है। पर पिछले कुछ साल से राज्य पयर्टन विभाग ने गयाजी में पिंडदान के पैकेज बनाती है। इस साल ऐसे किसी पैकेज की घोषणा नहीं हुई है।

करीब 30 करोड़ रुपये का होगा नुकसान

कोरोना महामारी को लेकर सरकार ने पितृपक्ष मेले पर प्रतिबंध लगा दिया है। मेला 1 सिंतबर से प्रारंभ होकर 17 सिंतबर तक चलना था। मेले पर प्रतिबंध लगने से करीब 30 करोड़ रुपये  के कारोबार पर असर पड़ेगा। विष्णुपद प्रबंधकारिणी समिति के सचिव गजाधर लाल पाठक का कहना है कि एक पखवारे के मेला से गयापाल पंडा सहित कई समाज के लोगो का जीवन यापन होता था। इसकी कमाई से एक वर्ष तक पंडा समाज अपनी जीवन-यापन करते हैं। ऐसी ही चार महीने से विष्णुपद मंदिर बंद है, जिससे पिंडदानी नही आ रहे हैं।इससे पंडा समाज के बीच आर्थिक संकट गहरा गया है। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन पिंडदान की कहीं भी महत्‍ता नही है, क्योंकि पिंडदान एक वेदी पर नही कई वेदियों पर किया जाता है। ऐसे में ऑनलाइन पिंडदान संभव नही है। वही गयापाल पुरोहित देवनाथ मेहरवार कहते है कि पितृपक्ष मेले पर राज्यसरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया गया है, जिससे दो से ढाई लाख लोग प्रभावित हो जाएंगे। इनमें पंडित, पटवा समाज एवं कारोबारी शामिल हैं।

गयाजी को पितृतीर्थ  भी कहते हैं

अगर श्राद्ध का महाकुम्भ कहीं नजर आता है तो वह गयाजी में है। यह वही स्थान है जहां लोग देश विदेश से अपने पूर्वजो को मोक्ष दिलाने के लिए प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष में पिंडदान को लेकर आते हैं। सनातन धर्म में पितृपक्ष का काफी महत्व है, जहां गया धाम में आकर पावन अंतःसलिला फल्गु के पवित्र जल से पिंडदान व तर्पण करते है। धार्मिक मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति अपने पूर्वजो की आत्मा की शान्ति की कामना रखता है,उद्धार चाहता है एवं नरक से स्वर्ग में भेजने के लिए पिंडदान करते है। इसी कारण से पितृपक्ष में बड़ी संख्या में पिंडदानी पिंडदान करते है। साथ ही माता पिता सहित सातो पीढियो का उद्धार हित है। यह भी माना जाता है कि भगवान विष्णु स्वयं पितृदेवता के रूप में यहां मौजूद है। इसी लिए पितृतीर्थ भी कहा जाता है।

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