यहां लकड़ी के खूंटे को है ग्राम प्रधान का दर्जा, हर कार्य की पहली सूचना उसे देते हैं लोग


विविधताओं भरे इस देश में कई खूबसूरत परंपराएं हैं। ओडिशा में संबलपुर जिले के बामड़ा प्रखंड के कुसुमी, कंधबलंडा और बेतझरण गांव में लकड़ी के खूंटे को लोगों ने जीवन का हिस्सा बना लिया है। इसे ग्राम प्रमुख जैसा रुतबा हासिल है। इसकी अनुमति लेकर ही शादी-विवाह, पूजा-पाठ समेत तमाम शुभ कार्य संपन्न होते हैं। साल में एकबार धूमधाम से पूजा की जाती है। इस खूंटे को स्थानीय बोली में खूंट गौंटिया नाम से लोग पुकारते हैं।

27वें राजा की परिकल्पना
बामड़ा प्रखंड मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर जंगल और पहाड़ों से घिरे ये तीनों गांव आजादी से पहले बामड़ा रियासत के अधीन थे। इसके 27वें राजा बासुदेव सुढल देव ने आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच समन्वय बनाए रखने और गांव के शासन को दुरुस्त रखने के लिए खूंट गौंटिया की परिकल्पना की थी। यह करीब छह फीट लंबा और छह इंच चौड़ा सरगी लकड़ी का बना होता है। इसे गांव की सीमा पर किसी घने पेड़ के नीचे स्थापित किया जाता है, उस स्थान को देवमूल कहते हैं। मान्यता है कि इसकी स्थापना से सुख-समृद्धि आती है।

ग्राम प्रमुख और उनके परिजन होते हैं इसके प्रतिनिधि
ग्राम प्रमुख और उनके परिजन इस खूंट गौंटिया के प्रतिनिधि के रूप में काम करते हैं। हर साल नुआखाई और रक्षाबंधन के मौके पर ग्रामीण इकठ्ठा होकर खूंट गौंटिया की पूजा करते हैं। विवाह, व्रत, जन्म के अवसर पर वहां की मिट्टी घर लाकर पूजते हैं। कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व खूंट गौंटिया को निमंत्रण देना नहीं भूलते।

भुइयां और गोंड समाज के लोग पुकारते हैं खूंट नायक
इन तीनों गांवों में गोंड, भुइयां व अघरिया समाज के लोग रहते हैं। अघरिया इसे खूंट गौंटिया बोलते हैं। भुइयां और गोंड खूंट नायक भी कहते हैं। वर्ष 2005 में अंग्रेज लेखक उवे स्कोडा ने बामड़ा क्षेत्र का अध्ययन कर द अघरिया-ए पीजेंट कास्ट ऑन ए ट्राइबल फ्रंटियर नामक पुस्तक लिखी थी। पुस्तक में भी खूंट गौंटिया का जिक्र है।

200 वर्षो से चली आ रही परंपरा
कंधबलंडा गांव के ग्राम प्रमुख, तुलाराम नायक बताते है कि करीब 200 वर्षो से खूंट गौंटिया की परंपरा चली आ रही है। किसी भी शुभ कार्य के लिए पहला न्योता खूंट गौंटिया को ही देते हैं। रक्षाबंधन पर खूंट गौंटिया को राखी भी बांधते हैं। बामरा के इन गांवों में यह परंपरा अब भी जीवित है।