“यो यच्छ्रद्धः स एव सः " अर्थात जो जैसी श्रद्धा करता है, वह वैसा ही हो जाता है।

 विद्वान वक्सटन कहा करते थे कि मैंने अपनी वृद्धावस्था तक मनुष्यतत्त्व के बारे में बहुत अधिक अनुभव एकत्रित किए हैं। उनमें यह अनुभव सर्वोपरि है, "विश्वासों के आधार पर जीवन का स्थूल रूप तैयार होता है।"


 


महापुरुष चार्ल्स डिक्सन का कथन है, "जिस मनुष्य की जैसी आंतरिक भावनाएँ होंगी, उसकी सारी बाह्य रूपरेखा वैसी ही बन जाएगी।" 


महर्षि वसिष्ठ का मत है, "बीज की जाति का ही पौधा उगता है और संकल्पों की जाति की परिस्थितियाँ पैदा होती हैं।"


 गीता कहती है, “यो यच्छ्रद्धः स एव सः " अर्थात जो जैसी श्रद्धा करता है, वह वैसा ही हो जाता है। 

सचमुच विश्वासों के आधार पर ही मनुष्य अपने लिए सुख-दुःख, उन्नति-अवनति, बंध-मोक्ष की भूमिका तैयार करता है। जो सोचता है कि मैं शिव हूँ, वह शिव है, जिसका विश्वास है कि मैं जीव हूँ, वह जीव है। अपने को दीन-दुखी, दरिद्र, अयोग्य, असमर्थ, अभागा, अशक्त मानते हैं, वे वास्तव में वैसे ही हैं। किंतु जिनका विश्वास है कि हम अपने भाग्य के निर्माता हैं, ईश्वर के अंश हैं, सर्वशक्तिमान आत्मा हैं, वे निस्संदेह वैसे ही हैं। जैसे विश्वास होंगे, वैसी ही परिस्थितियाँ मिल जाएँगी।

 भृंग नाम की मक्खी छोटे कीड़े को पकड़ ले जाती है, उसे अपने घर में रखती है, कीड़ा हर समय भृंग की आवाज सुनता है, उसी का रूप देखता है, धीरे-धीरे उसके चित्त में भृंग का रूप जम जाता है। तदनुसार उसके शारीरिक अंगों में परिवर्तन शुरू होता है और कुछ ही समय में वह कीड़ा हू-ब-हू भृंग बन जाता है। तितली जिस प्रकार के फूलों पर रहती है प्राय: उन्हीं फूलों के रंग की हो जाती है। संगति के प्रभाव से आदमी के गुण-कर्म-स्वभाव बदल जाते हैं। एक मनुष्य बहुत सदाचारी है, किंतु दुष्टों की संगति में अधिक दिन रहे, तो उसी ढाँचे में ढल जाएगा, पहले जो बातें उसे बुरी लगती थीं, वही अच्छी लगने लगेंगी।  मन और मनुष्य में कुछ अंतर नहीं। जिसका जैसा मन है, वह मनुष्य भी उसी प्रकार का होगा।

अतः हमारा मन सदैव उत्कृष्ट चिन्तन से ओतप्रोत होना चाहिय  ।