कफन के सौदागरों के मंसूबों पर कील ठोकने का वक्त


प्रधान सम्पादक सुधांशु शेखर की टिप्पणी - सन्दर्भ: 'कोरोना की भयावहता' 

देश इन दिनों कोरोना की भयावहता से त्रस्त है. कोरोना की इस दूसरी लहर ने केंद्र से लेकर राज्य सरकारों, आम से लेकर खास, प्रशासन से लेकर न्यायालयों तक को झकझोर दिया है. एक ओर जहां प्रकाश की गति से भी तेज गति से बढ़ रही कोरोना महामारी की भयावह त्रासदी लोगों को डरा रही है, लोग आक्सीजन-वैक्सीन-जीवन रक्षक औषधियों-अस्पतालों में बेड-वेंटीलेटर आदि के लिए गुहार लगा रहे हैं, चिकित्सा सुविधा के अभाव में मृतकों के परिजन श्मशान में अंत्येष्टि के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षा कर रहे हैं, नये श्मशान बनाये जा रहे हैं, एक दिहाड़ी मजदूर कोरोना प्रतिबंधों, लाकडाउन के कारण बेरोजगार हो परिवार का पेट भरने के लिए अपनी पत्नी के गहने बंधक रखने पर मजबूर है, वहीं कुछ लोग इस महामारी से अनुचित लाभ उठाने में तनिक भी नहीं हिचक रहे हैं. 

लाशों का व्यापार करने वाले इन गिद्धों के लिए कोई भी सजा अपर्याप्त है क्योंकि ये कराहती मानवता के गुनहगार हैं, अक्षम्य अपराधी हैं. कोरोना प्रोटोकाल का उल्लंघन कर पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न कराकर महामारी के संक्रमण में बढ़ोतरी कराने का चुनाव आयोग को प्रत्यक्ष दोषी करार देते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने उसे हत्या का दोषी करार दिया और गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए. मद्रास से लेकर इलाहाबाद, पटना से लेकर दिल्ली तक के हाई कोर्ट, यहां तक की देश की सर्वोच्च अदालत ने भी महामारी से निपटने में अक्षम केंद्र और राज्य सरकारों की तीव्र भर्त्सना की है और कई दिशानिर्देश जारी किए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने तो महामारी से निपटने के लिए टास्क फोर्स तक का गठन कर दिया है. 

अदालत की यह तल्ख टिप्पणी याद रखी जायेगी कि समस्याओं के प्रति सरकार शुतुरमुर्ग की तरह चेहरा छिपा सकती है, आंखें मूंद सकती है, हम नहीं. यदि चुनाव आयोग हत्या का दोषी हो सकता है तो दवाओं का कालाबाजारी करने वाले, अस्पतालों में बेड दिलाने के लिए धन वसूलने वाले, अंत्येष्टि के लिए पैसे लेने वाले, पुराने कफन को दुबारा बेचने वाले भी तो कम दोषी नहीं हैं. कोरोना किस गति से बढ़ रहा है, इसका अंदाज इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 14 अप्रैल को देश में प्रति घंटे संक्रमितों की संख्या 8348 तथा मृतकों की संख्या 43 थी, वह 24 अप्रैल को बढ़कर क्रमशः 14449 और 109 हो गयी जबकि 9 अप्रैल को प्रति घंटे कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर 17500 और मृतकों की संख्या 170 हो गयी.

ममता बनर्जी ने तीसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान कहा था कि कोरोना की रोकथाम उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है, चुनाव के दौरान भी उन्होंने चुनाव आयोग की आलोचना की थी और चुनावी रैलियों में उमड़ रही भारी भीड़ के कारण कोरोना के तेजी से फैलने की आशंका के मद्देनजर आयोग को सुपरस्प्रेडर के रूप में कड़ी आलोचना की थी, हालांकि उनकी सभाओं में भी भारी भीड़ उमड़ी थी लेकिन उनकी नाराजगी आठ चरणों में चुनाव को लेकर थी क्योंकि उनका मानना था कि यह सब कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इशारों पर किया गया था ताकि उन्हें प्रचार का अधिक से अधिक मौका मिल सके. ममता ने शपथ ग्रहण के दूसरे ही दिन कोरोना से निपटने के लिए कई कदमों की घोषणा की. ममता ने कहा कि कोरोना से लड़ने के लिए मैं कई कदमों की घोषणा कर रही हूं. कृपया मुझे गलत न समझें. कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए ये कदम अपरिहार्य हैं. ममता ने शॅापिंग माल्स, स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स, जिम, सिनेमा हाल आदि को बंद रखने के अलावा लोकल ट्रेनों को बंद करने, मेट्रो ट्रेन सहित अन्य प्रकार के परिवहन संसाधनों को 50 प्रतिशत क्षमता के साथ परिचालन करने, बैंकों को सुबह 10.00 बजे से दोपहर 2.00 बजे तक खोलने, राज्य में आने वाले सभी विमान यात्रियों के लिए 72 घंटे पहले का कोरोना निगेटिव (आरटी-पीसीआर) प्रमाणपत्र अनिवार्य करने, ऐसे प्रमाणपत्र देने में असफल लोगों को अपने खर्च पर 14 दिनों तक क्वारंटीन होने, लंबी दूरी की ट्रेनो तथा बस से आने वाले यात्रियों के लिए भी यह प्रमाणपत्र अनिवार्य करने जैसे कदमों की घोषणा की. 

इतना ही नहीं, उन्होंने यह सुनिश्चित करने को कहा कि कोरोना संक्रमितों को चिकित्सा सुविधा में किसी प्रकार की कोताही न हो. देश में आक्सीजन की भारी कमी तथा इसके अभाव में देश भर में बढ़ती मृतक संख्या को ध्यान में रखकर उन्होंने राज्य भर में आक्सीजन संयंत्रों की स्थापना की दिशा में पहल की है और इसी पहल के तहत केवल उत्तर 24 परगना में नौ संयंत्रों की स्थापना का काम युद्धस्तर पर चल रहा है. कोरोना बेड्स की संख्या बढ़ायी जा रही है, नये सेफ होम, क्वारंटीन सेंटर तथा टीकाकरण केंद्रों की संख्या बढ़ायी जा रही है. सरकार हमारी सहायता के लिए यथासंभव हर कदम उठा रही है. 

सरकार की इस ईमानदार, प्रशंसनीय तथा दूरगामी प्रभाव वाले कदमों को हमारे आंतरिक सहयोग की नितांत आवश्यकता है. राज्य में स्थिति अभी नियंत्रण से बाहर नहीं है और अन्य प्रभावित राज्यों की तुलना में यहां आक्सीजन, बेड्स आदि के लिए हाहाकार नहीं है, संक्रमितों को लेकर दर-दर भटकने की दुखद त्रासदभरी परिस्थितियां नहीं हैं. यहां तक कि चुनाव के दौरान ममता को सुशासन का पाठ पढ़ाने तथा भ्रष्टाचार की आलोचना करने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज्य से आये एक दंपति को बंगाल में ही चिकित्सा सुविधा मिली. अयोध्या के इस दंपति को अपने प्रदेश के छह अस्पतालों ने आक्सीजन की कमी के कारण भर्ती लेने से मना कर दिया था. दंपति एंबुलेंस से 850 किलोमीटर की यात्रा कर चिंसुरा पहुंचा जहां उन्हें भर्ती  किया गया. यह ठीक है कि बंगाल में इस मोर्चे पर काफी कुछ किया जाना बाकी है लेकिन ममता बनर्जी इससे निपटने के लिए जिस प्रकार सक्रिय हैं, गंभीर हैं तथा त्वरित गति से हर संभव कदम उठा रही हैं, वह हमें आश्वस्त करता है.
 
और कितना पतन बाकी हैः महामारी के दुखद दौर में देश के विभिन्न भागों से जो खबरें आ रही हैं, वे हमें उद्वेलित करती हैं, हमारे मानवीय मूल्यों पर सवालिया निशान लगाती हैं, हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि हम और कितना नीचे गिरेंगे, उसकी कोई सीमा भी है या नहीं. उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि अनगिनत लाशों की कतारें, बिलखते परिजनों के हृदयविदारक दृश्य भी हमें द्रवित नहीं करते, हम चंद पैसों के लिए कराहती मानवता की चीख नहीं सुन पाते. बिहार से आयी एक खबर में कहा गया है कि वहां कोरोना संक्रमण से मृत व्यक्ति के परिजनों से अंतिम संस्कार के पैसे वसूले जा रहे हैं जबकि नीतीश सरकार ने निःशुल्क अंतिम संस्कार का आदेश दे रखा है. उत्तर प्रदेश से आयी खबर तो और विचलित और शर्मसार करने वाली है. खबरों में कहा गया है कि वहां कोरोना मृतकों के कफन को उतारकर उस पर नया स्टीकर चिपकाकर बेचा जा रहा है. श्वेत कफन का यह काला व्यापार. उप्र का ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें एक बेरोजगार, बेबस युवक सड़क पर गिरा दूध पीने को मजबूर है. बंगाल में भी कुछ खबरें हमारे इसी प्रकार के पतन को बयां करती हैं. देश के अन्य भागों में आक्सीजन, कोरोना की औषधि रेमडेशिविर आदि की कालाबाजारी चल रही है. यहां भी कुछ ऐसे ही अवैध, अनुचित तथा अक्षम्य अपराध सामने आये हैं. रोगियों की असहायता, बेबसी का अनुचित फायदा उठाने का एक मामला नदिया जिले के कल्याणी यक्ष्मा अस्पताल से आया है. कल्याणी के तीन अस्पताल कल्याणी यक्ष्मा अस्पताल, जवाहरलाल नेहरू अस्पताल और कल्याणी ईएसआई अस्पताल न केवल नदिया अपितु निकटवर्ती जिलों- उत्तर 24 परगना तथा मुर्शिदाबाद के कुछ हिस्से की जीवन रेखा हैं. ये अस्पताल आधुनिकतम सुविधाओं और चिकित्सकीय उपकरणों से सुसज्जित हैं. कल्याणी ईएसआई अस्पताल राज्य कर्मचारी बीमा योजना के लोगों के लिए है जबकि दो अन्य सर्वसाधारण के लिए है. कल्याणी यक्ष्मा अस्पताल को कोरोना चिकित्सा केंद्र के रूप में परिवर्तित किया गया है. यहां कोरोना संक्रमितों को बेड दिलाने के लिए 10,000 से 20,000 रुपये लिए जाते थे. मामला तब प्रकाश में आया जब श्यामनगर के एक रोगी से बेड के लिए 10,000 रुपये लिए गये. उस रोगी की मौत हो गयी लेकिन उसके परिजनों को इसकी जानकारी देने के पहले 10,000 रुपये और वसूले गये. परिजनों ने इस पर हंगामा कर दिया, अस्पताल में लिखित शिकायत की और पुलिस को सूचना दी गयी. जांच में पता चला कि सरसों में ही भूत है. अस्पताल के ही चार कर्मचारियों के इस गिरोह में शामिल होने की बात प्राथमिक जांच में सामने आयी है. एक को बर्खास्त कर दिया गया है. 

कोलकाता में पार्क सर्कस में एक व्यक्ति को कोरोना की दवा रेमडेशिविर की कालाबाजारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है. उस पर इस दवा के 4,000 कीमत के एक डोज (6 वायल्स) के एक वायल के लिए 21,000 रुपये लेने का आरोप है. महानगर तथा राज्य के अन्य भागों से भी इस तरह की खबरें आ रही हैं. बंगाल से नहीं, लेकिन एक अन्य राज्य से आयी एक खबर तो और भी भयावह तथा चिंताजनक है. खबरों के अनुसार गुड़गांव के एक अस्पताल के स्टाफ ने आक्सीजन न होने के कारण मरीजों को उनके हालात पर छोड़ दिया और वहां से चले गये. इस बीच, कुछ मानवीय पहलू के समाचार भी हैं जो हमारी वास्तविक संस्कृति, विरासत, दयालुता तथा संकट की घड़ी में सहयोग की हमारी शाश्वत परंपरा के द्योतक तथा संवाहक हैं. कई निजी संस्थानों, विद्यालयों तथा प्रतिष्ठानों ने कोरोना संक्रमितों की चिकित्सा के लिए अपने परिसर उपलब्ध कराये हैं, आर्थिक मदद दी है, वहीं मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज थाना पाड़ा पूजा कमिटी ने एक रुपये में लोगों को दाल-भात-तरकारी और मिठाई देने की व्यवस्था की है ताकि कोरोना के कारण कोई भूखा न रह जाये. लोग हीनभावना से ग्रस्त न हों, उन्हें यह नहीं लगे कि वे मुफ्त में खा रहे हैं, इसलिए एक रुपया लिया जा रहा है. 

ये हमारी वर्तमान गंभीर संकट के दो चित्र हैं - एक परहित सरिस धरम नहीं भाई की हमारी परंपरा, संस्कृति का द्योतक तो दूसरा परपीड़ा सम नहीं अधमाई का चरम पतनशील चरित्र. आज हम चाहे विश्व के वृहत्तम लोकतंत्र होने का दंभ भर लें, पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का ढिंढोरा पीट लें, आत्मनिर्भरता का शंखनाद कर लें और पुनः विश्वगुरु बनने की दिशा में अग्रसर होने का अहंकार पाल लें, सच तो यह है कि हमारा नैतिक पतन पहले से कहीं अधिक हुआ है. हम हवा में तैर रहे हैं, हवा में बातें कर रहे हैं, हम आज भी यह अनुमान लगाने में असमर्थ हैं, या नहीं समझने की जिद ठान बैठे हैं कि हमारी प्राथमिकता क्या है, लेकिन वास्तविकता से कब तक मुंह मोड़ेंगे. सरकार इस ओर ध्यान देगी,  वास्तविकता समझेगी. इसके साथ ही हमारे भी कुछ दायित्व, कर्तव्य हैं. हमें सरकार के जनोपयोगी कदमों के सफल, सत्वर क्रियान्वयन के लिए एक आदर्श नागरिक की तरह सकारात्मक सोच के साथ सहयोग करने में तत्पर रहना होगा. हमें यह याद रखना चाहिए कि जब हम अपनी तात्कालिक लाभ के लिए किसी की अवैध, अनुचित मांग, लोलुपता का समर्थन करते हैं, उसे धन देते हैं तो हम दूसरों के लिए खंदक खोद रहे होते हैं, रक्तपीपासु भेड़िये को खून का स्वाद चखा रहे होते हैं, लाशों के सौदागरों के चंगुल में अपनी वर्तमान और अगली पीढ़ी को सौंप रहे होते हैं. हम उन लाखों गरीबों के हक छीन रहे होते हैं, जिनके पास खाने के पैसे नहीं हैं तो वे कालाबाजारियों, उत्कोचजीवियों, मानवता के दुश्मनों की मुट्ठी कैसे गरम कर पायेंगे और चिकित्सा-दवा आदि के अपने मौलिक अधिकार से वंचित रह जायेंगे और इसके एकमात्र दोषी हंम होंगे, केवल हम. कोरोना के खिलाफ जंग में हमारी जीत, मानवता की जीत सुनिश्चित है और हम जितना सजग, सतर्क, सकारात्मक रहेंगे, जीत उतनी ही शीघ्रता से मिलेगी.