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भगवान राम को जूठे बेर खिलाने वाली शबरी के वंशजों का भविष्य संवार रहे 'पुलिस बाबा'


एक ट्रैफिक कांस्टेबल का क्या काम है? सड़क पर वाहनों को प्रबंधित करना, लेकिन अरूप मुखर्जी जुदा हैं.  कोलकाता पुलिस के साउथ ट्रैफिक गार्ड में तैनात 44 साल के अरूप एक पूरे समुदाय को प्रबंधित कर रहे हैं। ऐसा समुदाय, जो खुद को शबरी का वंशज कहता है, जिन्होंने भगवान श्रीराम को जूठे बेर खिलाए थे. अरूप 'शबर' नामक इस आदिवासी समुदाय के बच्चों के लिए पुरुलिया जिले के पुंचा थानांतर्गत पांडुई ग्राम में नि:शुल्क आवासीय स्कूल चलाते हैं. यहां उनके पढऩे-लिखने व रहने से लेकर कपड़े व चिकित्सा तक की व्यवस्था है. सब कुछ नि:शुल्क. यह अरूप के अथक परिश्रम का ही फल है कि एक समय अस्तित्व खोने की कगार पर खड़ा यह समुदाय आज पुनरुत्थान की राह पर अग्रसर है. मूल रूप से पांडुई ग्राम के ही रहने वाले अरूप अपने वेतन का 80 फीसद स्कूल को चलाने में खर्च कर देते हैं. बाकी फंड कुछ उदारमान लोगों से मिलता है. अरूप इन आदिवासियों के बीच 'पुलिस बाबा' और 'शबर पिता' के नाम से मशहूर हैं.


2011 से चला रहे स्कूल
1999 में ट्रैफिक कांस्टेबल की नौकरी मिलने के बाद अरूप ने पहले महीने के वेतन से ही स्कूल के लिए रुपये जोडने शुरू कर दिए थे. परिवार की जरुरतों से लाख समझौते कर 2010 तक उन्होंने ढाई लाख रुपये जमा किए लेकिन ये काफी न था. मां से कहा तो उन्होंने पिता को न बताकर इस नेक काम के लिए 50,000 रुपये दिए। इसके बाद भी डेढ़ लाख का ऋण लेना पड़ा. स्कूल भवन के निर्माण के लिए उनके एक मित्र के पिता खिरद शशि मुखोपाध्याय ने 15 कट्ठा जमीन दान में दे दी. 2011 में स्कूल भवन का निर्माण पूरा हुआ और उसी साल पुंचा नवदिशा मॉडल स्कूल ने शबर समुदाय के 15 बच्चों के साथ सफर शुरू किया. आज इस स्कूल में 125-130 बच्चे पढ़ रहे हैं. स्कूल में सात शिक्षक हैं, जो नि:शुल्क पढ़ाते हैं। वर्तमान में स्कूल का कामकाज उनके सेवानिवृत्त पिता देख रहे हैं. अरूप कोलकाता से ही परिचालन का पूरा ध्यान रखते हैं और अक्सर वहां जाते हैं.

आइआइटी बांबे ने भी सराहा
अरूप के कार्यों को आइआइटी बांबे ने भी सराहते हुए उन्हें नई पीढ़ी के नौजवानों को प्रेरित करने के लिए गत 15 जून को अपने एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया था. राजस्थान की एक संस्था ने अरूप को 'टीचर्स वॉरियर अवार्ड' और बेंगलुरु की दो संस्थाओं ने सर्वोत्तम सोशल वर्कस के खिताब से नवाजा है.

कौन हैं शबर
शबर खुद को शबरी का वंशज बताते हैं। यह आदिवासी समुदाय वर्तमान में पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में रह रहा है. बंगाल में पुरुलिया व बांकुड़ा जिलों के जंगल महल इलाके में ये रहते हैं. शबर बंगाल में सर्वाधिक पिछड़ा व उपेक्षित आदिवासी समुदाय है. एक समय इनका हाल यह था कि चोरी-डकैती के अलावा उन्हें कुछ नहीं आता था. इसलिए अंग्रेजों ने उन्हें 'क्रिमिनल ट्राइब' (अपराध करने वाली जनजाति) घोषित कर दिया था. पुरुलिया में वर्तमान में करीब 20,000 शबर हैं. इतनी ही आबादी पासवर्ती जिले बांकुड़ा में भी है। एक समय इस समुदाय का लगभग हरेक बच्चा कुपोषण और नौजवान नशाखोरी का शिकार था, लेकिन अरूप के प्रयास से उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधरी है.

शबर पिता' ने करवाया था चोरी-डकैती छोडने का प्रण
अरूप ने बताया-'शबरों की जिंदगी में सुधार लाने के लिए उनकी मानसिकता बदलनी सबसे जरूरी थी. मैंने उनसे चोरी-डकैती छोड़कर काम-धंधे में लगने का प्रण करवाया. उन्होंने भी मेरी बात मानी और आज वे विभिन्न काम कर रहे हैं. समुदाय के नौजवान भिन्न राज्यों में जाकर रोजगार कर रहे हैं.' अरूप ने आगे कहा-'शबर मेरी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा हैं. उनके बिना मैं जी ही नहीं पाऊंगा. इस समुदाय के लिए कुछ करके मुझे जो खुशी मिलती है, उसे शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है.

बचपन में फूटी थी सेवा की पौध
अरूप ने कहा-'बचपन में जब भी कहीं चोरी-डकैती होती थी तो दादाजी कहते थे कि इसमें शबरों का हाथ है. मैं जब उनसे पूछता था कि वे ऐसा क्यों करते हैं तो कहते थे कि वह लोग भूख और शिक्षा के अभाव में ऐसा करते हैं. तब मैंने उनसे कहा था कि बड़ा होकर उनके पढने-लिखने और खाने-पीने की व्यवस्था करूंगा.' अरूप ने सहज बाल मन से जो बात कही थी, भले दादा ने उसे गंभीरता से न लिया, लेकिन सेवा की यह पौध तभी फूट गई थी. अरूप के पिता पंकज मुखर्जी पश्चिम बंगाल पुलिस के सेवानिवृत्त सब इंस्पेक्टर हैं. परिवार में मां रेबा मुखर्जी, पत्नी एशा मुखर्जी और दो जुड़वां बच्चे हैं। बेटे का नाम अनिर्बाण और बेटी का नाम सागरिका है.