Thursday, June 9, 2016

मोदी और ओबामा ने की चरमपंथ की चुनौती पर चर्चा


वाशिंगटन: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ चरमपंथ के कारण उपजी चुनौतियों पर चर्चा की। दोनों नेताओं ने इस मुद्दे से निपटने के लिए नागरिक समाज और अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया। ओबामा प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति ने चरमपंथ के उभार को लेकर और इस चुनौती से निपटने के लिए सभी देशों के मिलकर काम करने की जरूरत पर व्यापक एवं गंभीर बातचीत की।

अधिकारी ने कहा कि दोनों नेताओं ने इस मुद्दे से निपटने के लिए नागरिक समाज और अल्पसंख्यक समुदायों की पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत को भी रेखांकित किया। अधिकारियों ने कहा कि हालांकि भारत में मानवाधिकारों या धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे पर कोई विशेष चर्चा नहीं हुई। भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे नहीं लगता कि यह मुद्दा आज चर्चाओं में उठाया गया।’’

इसी बीच, टॉम लैंटोस मानवाधिकार आयोग ने भारत में मानवाधिकारों की मौजूदा स्थिति पर, मौलिक स्वतंत्रता के सामने उपजी चुनौतियों और उनके बढ़ सकने के अवसरों की पड़ताल के लिए एक सुनवाई आयोजित की। आयोग के समक्ष बयान देते हुए कई विशेषज्ञों ने भारत में मानवाधिकारों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की।

सदन के 18 सदस्यों के एक द्विदलीय समूह ने प्रतिनिधियों ट्रेंट फ्रैंक्स और बैटी मैकॉलम के नेतृत्व में सदन के स्पीकर पॉल रेयान को पत्र लिखकर उनसे अपील की कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी बैठक के दौरान भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के मुद्दे को प्राथमिकता के साथ रखें। उन्होंने लिखा कि मुस्लिमों, ईसाइयों, बौद्धों और सिखों समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ चल रही हिंसा और प्रताड़ना को देखते हुए ऐसा किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी ने आज अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करना है। पत्र में लिखा गया, ‘‘हम आपसे आदरपूर्वक अनुरोध करते हैं कि आप प्रधानमंत्री के साथ अपनी बैठकों के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के ‘साझा मूल्य’ को अपनी बातचीत में प्राथमिकता बनाएं।’’कांग्रेस के सदस्यों ने लिखा, ‘‘मुस्लिमों, ईसाइयों, बौद्धों और सिखों समेत धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों ने भारत में चल रही हिंसा और प्रताड़ना को दशकों से झेला है और वे आज भी ऐसे माहौल में जी रहे हैं, जहां ज्ञात साजिशकर्ता बिना किसी सजा के हिंसा को अंजाम देते हैं।’’

पत्र में कहा गया, ‘‘यह अमेरिका और भारत के सर्वश्रेष्ठ हित में होगा कि वे इस विकसित होती साझेदारी के साझे मूल्य के तौर पर धार्मिक स्वतंत्रता की एकबार फिर पुष्टि करें और यह सुनिश्चित करें कि हिंसा के ऐसे भयावह कृत्यों के लिए न्याय एवं जवाबदेही से जुड़ी बातचीत होती रहे।’’ पत्र में सांसदों ने ऐसे हिंसक हमलों के कई विशेष उदाहरण दिए जिनमें धार्मिक अल्पसंख्यक या तो मारे गए हैं या विस्थापित हो गए हैं। उन्होंने कहा कि भारत में मानवाधिकार समूहों ने कुछ समूहों विशेष पर किए गए इन हमलों की जांच की है लेकिन भारत में ऐसे हमलों को लेकर सजा में छूट का माहौल बना हुआ है और कई पीड़ितों को कभी न्याय नहीं मिलता। फ्रैंक्स ने कहा, ‘‘भारत और अमेरिका के साझा मूल्यों पर गौर करने के दौरान धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक मानवाधिकार पर पर्याप्त गौर किया जाना बेहद महत्वपूर्ण है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों ने दशकों से प्रताड़ना, भेदभाव, धमकी और हिंसक हमले झेले हैं और इन मामलों में अक्सर न्याय की उम्मीद बहुत कम रही है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैं उम्मीद करता हूं कि भारत में हर व्यक्ति को सच्ची धार्मिक स्वतंत्रता मिले, फिर चाहे उनका धर्म कोई भी हो।’’ मैककॉलम ने कहा, ‘‘भारत और अमेरिका के बीच का महत्वपूर्ण संबंध हमारे साझा लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक- मुस्लिम, ईसाइय, बौद्ध और सिख- बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन करने की आजादी के हकदार हैं।’’

इस पत्र पर जिन कांग्रेस सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, उनके नाम हैं- क्रिस स्मिथ, जुआन वर्गास, एंड्रे कारसन, कीथ एलिसन, पैट्रिक मीहान, कीथ रोथफस, रैंडी वेबर, डेन किल्डी, माइक होंड, जॉन कोन्यर्स जूनियर, जॉन ग्रामेंडी, रॉबर्ट एडरहोल्ट, एना इशू, जो पिट्स, बारबरा ली और डेविड वालादाओ।