Wednesday, May 11, 2016

उत्तराखंड को चाहिए नया जनादेश


जल्दी का काम शैतान का। यह कहावत जब गढ़ी गई होगी, तो हो सकता है कि संदर्भ कुछ और रहा हो। मगर उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव के दस महीने पहले ही सरकार बनाने के लिए जैसी हड़बड़ी भारतीय जनता पार्टी ने दिखाई, उसमें यह कहावत फिट बैठती है।

इसी जल्दबाजी के चक्कर में वह एक के बाद एक गलती करती गई और नतीजा सामने है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मंगलवार को विधानसभा में हुए शक्ति परीक्षण के नतीजे आधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किए गए हैं, लेकिन विधायकों के जो दावे हैं, उसके आधार पर माना जा सकता है कि भाजपा को उसके मिशन में सफलता नहीं मिली है। इस शक्ति परीक्षण के साथ ही पिछले लगभग दो माह से चल रहा उत्तराखंड का संकट सुलझ गया है, ऐसा भी नहीं है। विधानसभा में हुए शक्ति परीक्षण की रिपोर्ट आज सुप्रीम कोर्र्ट को सौंपी जाएगी और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय आगे सुनवाई करके फैसला देगा।

हां, शक्ति परीक्षण को लेकर जो अनुमान लगाए जा रहे हैं, उन्हें सही मानें, तो यह जरूर कह सकते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री और उनकी कांग्रेस पार्टी आधी लड़़ाई जीत चुकी है। यह सर्वोच्च न्यायालय के रुख पर निर्भर करेगा कि वह शक्ति परीक्षण के परिणामों के आधार पर तुरंत राज्य से राष्ट्रपति शासन हटाने का फैसला करता है या पूरे प्रकरण का एक साथ निपटारा करता है।
नतीजा अब जो भी हो, मगर यह सवाल तो बना ही रहेगा कि भाजपा ने यह क्यों किया? और इससे उसे भला क्या फायदा हुआ? तकनीकी तौर पर भाजपा यह कहकर इस पूरे घटनाक्रम से पल्ला झाड़ सकती है कि समस्या पैदा करने में उसका नहीं, कांग्रेस के बागी विधायकों का हाथ था।

यह उसने कहा भी है। मगर राजनीति में धारणा का अपना महत्व है। आम धारणा यही बनी है कि उत्तराखंड में इस संकट के लिए जितने जिम्मेदार कांग्रेस और उसके बागी विधायक हैं, उतनी ही भाजपा भी है। उत्तराखंड के पहले कांग्रेस शासित राज्य अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ, और जब उत्तराखंड में भी सत्ता परिवर्तन के लिए कुछ वैसा ही तरीका अपनाए जाने के लक्षण दिखे, तो मामला कानूनी और सांविधानिक दांवपेच का न होकर विशुद्ध राजनीतिक बन गया। राज्यपाल की ओर से तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को 28 मार्च को विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहा गया था। इसके ठीक एक दिन पहले यानी 27 मार्च को केंद्र सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा करके इस धारणा की पुष्टि की कि वह येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस को राज्य की सत्ता से हटाना चाहती है। बाद में उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के घटनाक्रमों ने इन धारणाओं को मजबूती ही प्रदान की है।

भाजपा के रणनीतिकार जब नफा-नुकसान का आकलन करने बैठेंगे, तो पाएंगे कि उन्हें इस पूरे प्रकरण में घाटा ही घाटा हुआ है। कांग्रेस में सरकार और संगठन के स्तर पर किस तरह के आंतरिक मतभेद थे, यह अब सबको पता है। चुनाव के नजदीक आते-आते इस आंतरिक असंतोष में बढ़ोतरी ही होती और आपसी झगड़ों के साथ चुनाव में जाने का क्या परिणाम होता, इसका अंदाज लगाना कठिन नहीं है। भाजपा ने चुनाव से पहले कांग्रेस को अपना घर दुरुस्त करने का मौका उपलब्ध करा दिया है। स्टिंग ऑपरेशन और तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बावजूद हरीश रावत और मजबूत हो गए हैं। कांगे्रस की ओर से उन्हें राज्य का नेतृत्व देर से सौंपे जाने को लेकर पहले भी उनके प्रति सहानुभूति थी। इस घटनाक्रम के दौरान भाजपा और कांग्रेस के अन्य नेताओं की तुलना में वह खुद को बेचारा साबित करने में सफल रहे हैं।

सामान्य हालात में पार्टी में अपने जिन विरोधियों से निपटने में उन्हें खासी मुश्किल हो सकती थी, भाजपा की मदद से वे कांटे भी उनके रास्ते से साफ हो गए हैं। दूसरी तरफ, भाजपा ने अपनी कुछ कमजोरियों को उजागर कर दिया है। प्रदेश में उसके पास ऐसा एक भी नेता नहीं है, जो संकट के समय नेतृत्व कर सके। भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कभी कांग्रेस से आए सतपाल महाराज की ओर ताक रहा था, तो कभी इस असमंजस में था कि पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर दांव लगाए या रमेश पोखरियाल पर। पूरी ताकत झोंकने के बाद भी वह कांग्रेस से एक से ज्यादा विधायक को साथ नहीं ला सके। नेतृत्व का संकट भाजपा के सामने अभी आगे तब तक बना रहने वाला है, जब तक कि केंद्रीय नेतृत्व यह तय नहीं कर लेता कि उसे पुराने व उसकी नजर में खारिज किए जा चुके नेताओं से ही काम चलाना है या नए, अनुभवहीन व ऐसे युवाओं को आगे करना है, जिनकी क्षमता अभी किसी स्तर पर आंकी नहीं गई है।

एक और सवाल जो पूछा जाना लाजिमी है, वह यह कि भ्रष्टाचार के कथित आरोपों में घिरी और हरीश रावत के स्वेच्छाचारी रवैये से परेशान होने के बावजूद, जैसा कि भाजपा और कांग्रेस के बागी विधायकों ने दावा किया है, कांग्रेस के विधायकों ने अंतरात्मा की आवाज सुनने की भाजपा की अपील पर ध्यान क्यों नहीं दिया? इसके दो ही कारण हो सकते हैं। एक, राज्य में फिलहाल हरीश रावत के नेतृत्व पर उनका भरोसा। यह इसलिए कि इस घटनाक्रम में जिस तरह की सहानुभूति उन्हें मिली है, वह आगे भी जारी रहेगी और इसका फायदा चुनाव में वह उठा सकेंगे। दूसरा, अन्य राज्यों या समुदायों की तुलना में उत्तराखंड के लोगों में राजनीति में खुलेआम पैसे के लेेन-देन को स्वीकार्यता न देना। ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में राजनीतिक भ्रष्टाचार नहीं है या पैसे का लेन-देन नहीं हो रहा। हाल ही के दिनों में हुए स्टिंग ऑपरेशन, चाहे वे सही हों या गलत, बताने के लिए पर्याप्त हैं कि यह बीमारी वहां किस तेजी से पैर पसार रही है। मगर कोई भी विधायक यह नहीं चाहेगा कि चुनाव में उतरने से पहले लोग उसके बारे में चर्चा कर रहे हों कि उसने पैसे लेकर दलबदल किया है। कांग्रेस के बागी नौ विधायकों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी बाकी है, लेकिन उन्हें शक्ति परीक्षण से बाहर करके न्यायालय ने दलबदल के प्रति अपना नजरिया तो स्पष्ट कर ही दिया है।

उत्तराखंड के इस प्रकरण में हालांकि आखिरी इबारत अभी लिखी जानी बाकी है, लेकिन राज्य में जिस तरह के हालात बन गए हैं, उनमें नए चुनावों से बेहतर विकल्प कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट यदि हरीश रावत सरकार को बहाल कर देता है, तब भी राज्य और उनकी पार्टी के लिहाज से बेहतर यही होगा कि वह जल्द से जल्द नया जनादेश लें। और यह जनादेश जिधर भी जाएगा, उसका असर पूरे देश की राजनीति पर दिखेगा।